निदा फ़ाज़ली — अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले (Nida Fazli — Ab Kaha Dusre Ke Dukh Se Dukhi Hone Wale) Class 10 Hindi Sparsh
📖 अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले
✍️ निदा फ़ाज़ली : जीवन-परिचय
📜 मूल पाठ
12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में जन्मे निदा फ़ाज़ली का बचपन ग्वालियर में बीता। निदा फ़ाज़ली उर्दू की साठोत्तरी पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। आम बोलचाल की भाषा में और सरलता से किसी के भी दिलोदिमाग में घर कर सके, ऐसी कविता करने में इन्हें महारत हासिल है। वही निदा फ़ाज़ली अपनी गद्य रचनाओं में शेर-ओ-शायरी पिरोकर बहुत कुछ को थोड़े में कह देने के मामले में अपने किस्म के अकेले ही गद्यकार हैं।
निदा फ़ाज़ली की लफ़्ज़ों का पुल नामक कविता की पहली पुस्तक आई। शायरी की किताब खोया हुआ सा कुछ के लिए 1999 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित निदा फ़ाज़ली की आत्मकथा का पहला भाग दीवारों के बीच और दूसरा दीवारों के पार शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। फ़िल्म उद्योग से संबद्ध रहे निदा फ़ाज़ली का निधन 8 फ़रवरी 2016 को हुआ। यहाँ तमाशा मेरे आगे किताब में संकलित एक अंश प्रस्तुत है।
🔤 कठिन शब्दार्थ
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शब्द |
अर्थ |
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साठोत्तरी |
साठ के दशक के बाद की |
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महत्वपूर्ण |
विशेष रूप से प्रसिद्ध/प्रमुख |
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आम बोलचाल |
सामान्य बातचीत की भाषा |
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दिलोदिमाग |
मन और मस्तिष्क |
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महारत |
विशेष दक्षता |
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गद्य रचना |
गद्य में लिखी गई रचना |
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शेर-ओ-शायरी |
कविता/शायरी |
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गद्यकार |
गद्य लिखने वाला लेखक |
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लफ़्ज़ |
शब्द |
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आत्मकथा |
अपने जीवन की स्वयं लिखी कहानी |
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संबद्ध |
जुड़ा हुआ |
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संकलित |
संग्रहित |
📌 प्रसंग
प्रस्तुत अंश निदा फ़ाज़ली के जीवन-परिचय से संबंधित है। इसमें लेखक के जन्म, बचपन, साहित्यिक विशेषताओं, प्रमुख पुस्तकों, साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा उनके निधन के बारे में जानकारी दी गई है।
📝 सरल अर्थ
निदा फ़ाज़ली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ, लेकिन उनका बचपन ग्वालियर में बीता। वे उर्दू की साठोत्तरी पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवियों में माने जाते हैं।
उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बहुत सरल और आम बोलचाल की भाषा में ऐसी बातें कहते हैं जो सीधे पाठक के दिल और दिमाग पर प्रभाव डालती हैं। वे अपनी गद्य रचनाओं में भी शेर और शायरी का प्रयोग करते हुए कम शब्दों में बहुत अधिक बात कहने के लिए जाने जाते हैं।
उनकी कविता की पहली पुस्तक ‘लफ़्ज़ों का पुल’ थी। उनकी शायरी की पुस्तक ‘खोया हुआ सा कुछ’ के लिए उन्हें 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी आत्मकथा दो भागों—‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के पार’—में प्रकाशित हुई।
निदा फ़ाज़ली फ़िल्म उद्योग से भी जुड़े रहे। उनका निधन 8 फ़रवरी 2016 को हुआ। प्रस्तुत पाठ उनके ‘तमाशा मेरे आगे’ नामक पुस्तक में संकलित एक अंश पर आधारित है।
💡 महत्वपूर्ण बातें
- जन्म: 12 अक्टूबर 1938, दिल्ली
- बचपन: ग्वालियर में बीता
- भाषा: उर्दू
- साहित्यिक पहचान: महत्वपूर्ण कवि और गद्यकार
- कविता की विशेषता: सरल और आम बोलचाल की भाषा
- पहली कविता-पुस्तक: ‘लफ़्ज़ों का पुल’
- साहित्य अकादेमी पुरस्कार: 1999
- पुरस्कार प्राप्त पुस्तक: ‘खोया हुआ सा कुछ’
- आत्मकथा: ‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के पार’
- फ़िल्म उद्योग से संबंध: हाँ
- निधन: 8 फ़रवरी 2016
- पाठ का स्रोत: ‘तमाशा मेरे आगे’
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. निदा फ़ाज़ली का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: निदा फ़ाज़ली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ।
प्रश्न 2. निदा फ़ाज़ली का बचपन कहाँ बीता?
उत्तर: उनका बचपन ग्वालियर में बीता।
प्रश्न 3. निदा फ़ाज़ली को 1999 में किस पुस्तक के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला?
उत्तर: उन्हें उनकी शायरी की पुस्तक ‘खोया हुआ सा कुछ’ के लिए 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
प्रश्न 4. निदा फ़ाज़ली की आत्मकथा किन दो भागों में प्रकाशित हुई?
उत्तर: उनकी आत्मकथा ‘दीवारों के बीच’ और ‘दीवारों के पार’ नामक दो भागों में प्रकाशित हुई।
प्रश्न 5. प्रस्तुत पाठ किस पुस्तक से लिया गया है?
उत्तर: प्रस्तुत अंश ‘तमाशा मेरे आगे’ नामक पुस्तक में संकलित है।
📖 अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले
गद्यांश–1 : सुलेमान और चींटियों की घटना
📜 मूल पाठ
बाइबिल के सोलोमन जिन्हें कुरआन में सुलेमान कहा गया है, ईसा से 1025 वर्ष पूर्व एक बादशाह थे। कहा गया है, वह केवल मानव जाति के ही राजा नहीं थे, सारे छोटे-बड़े पशु-पक्षी के भी हाकिम थे। वह इन सबकी भाषा भी जानते थे। एक दफ़ा सुलेमान अपने लश्कर के साथ एक रास्ते से गुज़र रहे थे। रास्ते में कुछ चींटियों ने घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी तो डर कर एक-दूसरे से कहा, ‘आप जल्दी से अपने-अपने बिलों में चलो, फ़ौज आ रही है।’ सुलेमान उनकी बातें सुनकर थोड़ी दूर पर रुक गए और चींटियों से बोले, ‘घबराओ नहीं, सुलेमान को ख़ुदा ने सबका रखवाला बनाया है। मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं हूँ, सबके लिए मुहब्बत हूँ।’ चींटियों ने उनके लिए ईश्वर से दुआ की और सुलेमान अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गए।
🔤 कठिन शब्दार्थ
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कठिन शब्द |
अर्थ |
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बादशाह |
राजा |
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हाकिम |
शासक |
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दफ़ा |
बार |
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लश्कर |
सेना |
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गुज़रना |
होकर निकलना |
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टाप |
घोड़े के पैर की आवाज़ |
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बिल |
रहने का छोटा गड्ढा/घर |
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फ़ौज |
सेना |
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घबराना |
डर जाना |
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ख़ुदा |
ईश्वर |
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रखवाला |
रक्षा करने वाला |
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मुसीबत |
परेशानी, संकट |
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मुहब्बत |
प्रेम |
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दुआ |
प्रार्थना |
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मंज़िल |
लक्ष्य, गंतव्य |
📌 प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखित पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने बाइबिल के सोलोमन अर्थात् कुरआन में वर्णित सुलेमान से जुड़ी एक घटना का उल्लेख किया है। इस घटना के माध्यम से लेखक ने मनुष्य के साथ-साथ छोटे जीवों के प्रति भी संवेदना और प्रेम की भावना को सामने रखा है।
📝 सरल अर्थ
लेखक बताता है कि बाइबिल में जिनका नाम सोलोमन और कुरआन में सुलेमान बताया गया है, वे ईसा से 1025 वर्ष पहले एक बादशाह थे। कहा जाता है कि वे केवल मनुष्यों के राजा नहीं थे, बल्कि छोटे-बड़े सभी पशु-पक्षियों पर भी उनका अधिकार था और वे उनकी भाषा समझते थे।
एक बार सुलेमान अपनी सेना के साथ किसी रास्ते से जा रहे थे। उनके घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनकर कुछ चींटियाँ डर गईं। उन्होंने दूसरी चींटियों से कहा कि वे जल्दी-जल्दी अपने बिलों में चली जाएँ, क्योंकि सेना आ रही है।
सुलेमान ने चींटियों की बातें सुन लीं। उन्होंने अपनी सेना को आगे बढ़ने से पहले थोड़ी दूर पर रोक दिया और चींटियों को आश्वस्त किया कि उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने उन्हें सबकी रक्षा करने वाला बनाया है और वे किसी के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि सबके लिए प्रेम हैं।
सुलेमान की इस संवेदनशीलता से चींटियाँ प्रसन्न हुईं और उन्होंने उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की। इसके बाद सुलेमान अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ गए।
💡 महत्वपूर्ण बातें
- सोलोमन को कुरआन में सुलेमान कहा गया है।
- सुलेमान एक बादशाह थे।
- पाठ के अनुसार वे केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के भी हाकिम थे।
- वे पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे।
- चींटियाँ घोड़ों की टाप सुनकर डर गई थीं।
- सुलेमान ने चींटियों की बात सुनकर उन्हें आश्वस्त किया।
- उन्होंने स्वयं को “सबके लिए मुहब्बत” बताया।
- चींटियों ने सुलेमान के लिए ईश्वर से दुआ की।
- इस प्रसंग में जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम, दया और संवेदनशीलता का भाव दिखाई देता है।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. सोलोमन को कुरआन में किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर: सोलोमन को कुरआन में सुलेमान के नाम से जाना जाता है।
प्रश्न 2. सुलेमान के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर: कहा गया है कि सुलेमान केवल मानव जाति के राजा नहीं थे, बल्कि छोटे-बड़े सभी पशु-पक्षियों के भी हाकिम थे और उनकी भाषा जानते थे।
प्रश्न 3. चींटियाँ क्यों डर गई थीं?
उत्तर: चींटियों ने घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि सुलेमान की सेना आ रही है, इसलिए वे डर गईं और एक-दूसरे से अपने-अपने बिलों में जाने के लिए कहने लगीं।
प्रश्न 4. सुलेमान ने चींटियों से क्या कहा?
उत्तर: सुलेमान ने चींटियों को घबराने से मना किया और कहा कि ख़ुदा ने उन्हें सबका रखवाला बनाया है। वे किसी के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि सबके लिए मुहब्बत हैं।
प्रश्न 5. चींटियों ने सुलेमान के लिए क्या किया?
उत्तर: चींटियों ने सुलेमान के लिए ईश्वर से दुआ की।
🌱 गद्यांश का मूल संदेश
इस छोटे-से प्रसंग में लेखक यह दिखाता है कि सच्ची संवेदनशीलता केवल मनुष्यों के दुख को समझने तक सीमित नहीं होती। छोटे-से-छोटे जीव के जीवन और भय को समझना भी करुणा और मानवीयता का हिस्सा है।
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गद्यांश–2 : शेख अयाज़ और चिड़िया का प्रसंग
📜 मूल पाठ
ऐसी एक घटना का ज़िक्र सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज़ ने अपनी आत्मकथा में किया है। उन्होंने लिखा है—‘एक दिन उनके पिता कुएँ से नहाकर लौटे। माँ ने भोजन परोसा। उन्होंने जैसे ही रोटी का कौर तोड़ा। उनकी नज़र अपनी बाजू पर पड़ी। वहाँ एक काला च्योंटा रंग रहा था। वह भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए।’ माँ ने पूछा, ‘क्या बात है? भोजन अच्छा नहीं लगा?’ शेख अयाज़ के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’
🔤 कठिन शब्दार्थ
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कठिन शब्द |
अर्थ |
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ज़िक्र |
उल्लेख |
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महाकवि |
महान कवि |
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आत्मकथा |
अपने जीवन की कहानी |
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कुआँ |
जल प्राप्त करने का स्थान |
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परोसा |
भोजन सामने रखना |
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कौर |
मुँह में रखने योग्य भोजन की मात्रा |
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बाजू |
हाथ का ऊपरी भाग |
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च्योंटा |
चींटा |
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बेघर |
जिसका घर न हो |
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घर वाला |
यहाँ किसी जीव का अपने घर में रहने वाला |
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कुएँ पर |
कुएँ के पास |
📌 प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश निदा फ़ाज़ली के पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज़ की आत्मकथा में वर्णित एक घटना का उल्लेख किया है। इस घटना के माध्यम से छोटे-से-छोटे जीव के प्रति संवेदना और करुणा को व्यक्त किया गया है।
📝 सरल अर्थ
शेख अयाज़ ने अपनी आत्मकथा में अपने पिता से जुड़ी एक घटना का वर्णन किया है।
एक दिन उनके पिता कुएँ से नहाकर घर लौटे। उनकी माँ ने उन्हें भोजन परोसा। जब उन्होंने रोटी का एक कौर तोड़ा, तभी उनकी नज़र अपनी बाजू पर पड़ी। वहाँ एक काला चींटा चल रहा था।
चींटे को देखकर वे अचानक भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए। उनकी पत्नी ने पूछा कि क्या भोजन अच्छा नहीं लगा। उन्होंने बताया कि ऐसी बात नहीं है।
उन्होंने कहा कि उनसे एक गलती हो गई है—उन्होंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। अर्थात् चींटा उनके शरीर पर आ गया था और संभवतः वह उनके शरीर पर अपने घर से दूर पहुँच गया था। इसलिए वे उस चींटे को वापस उसके घर के पास छोड़ने के लिए कुएँ की ओर जाने लगे।
💡 महत्वपूर्ण बातें
- इस घटना का उल्लेख शेख अयाज़ की आत्मकथा में मिलता है।
- शेख अयाज़ सिंधी भाषा के महाकवि थे।
- उनके पिता को अपनी बाजू पर एक काला चींटा दिखाई दिया।
- चींटे को देखकर उन्होंने भोजन छोड़ दिया।
- उन्हें लगा कि उन्होंने एक जीव को उसके घर से दूर कर दिया है।
- वे चींटे को उसके घर के पास छोड़ने के लिए वापस कुएँ की ओर गए।
- यह प्रसंग जीव-जंतुओं के प्रति करुणा और संवेदनशीलता को दर्शाता है।
- लेखक छोटे जीव के जीवन और उसके घर के महत्व को भी मनुष्य के समान महत्वपूर्ण मानने की भावना प्रस्तुत करता है।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. शेख अयाज़ कौन थे?
उत्तर: शेख अयाज़ सिंधी भाषा के महाकवि थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं का वर्णन किया है।
प्रश्न 2. शेख अयाज़ के पिता ने भोजन क्यों छोड़ दिया?
उत्तर: उनकी बाजू पर एक काला चींटा दिखाई दिया। उन्हें लगा कि उन्होंने उस चींटे को उसके घर से दूर करके बेघर कर दिया है। इसी भावना से उन्होंने भोजन छोड़ दिया।
प्रश्न 3. शेख अयाज़ के पिता चींटे को लेकर कहाँ गए?
उत्तर: वे चींटे को उसके घर के पास छोड़ने के लिए कुएँ की ओर वापस गए, जहाँ से वह उनके साथ आया था।
प्रश्न 4. इस घटना से शेख अयाज़ के पिता के चरित्र की कौन-सी विशेषता सामने आती है?
उत्तर: इस घटना से उनके दयालु, संवेदनशील और जीव-जंतुओं के प्रति करुणाभाव रखने वाले व्यक्तित्व का परिचय मिलता है।
प्रश्न 5. “मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है”—इस कथन का क्या आशय है?
उत्तर: शेख अयाज़ के पिता का आशय था कि चींटा अपने घर से दूर उनके शरीर पर आ गया था। उन्हें लगा कि उनकी वजह से वह अपने घर से अलग हो गया है, इसलिए उसे वापस उसके घर पहुँचाना उनका दायित्व है।
🌱 गद्यांश का मूल संदेश
यह घटना बताती है कि संवेदनशील व्यक्ति के लिए किसी छोटे जीव का घर और उसका जीवन भी महत्वपूर्ण होता है। शेख अयाज़ के पिता ने एक चींटे को भी बेघर होने के दुख के रूप में देखा और उसे उसके स्थान तक पहुँचाने की जिम्मेदारी महसूस की।
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गद्यांश–3 : नूह और घायल कुत्ते का प्रसंग
📜 मूल पाठ
बाइबिल और दूसरे पावन ग्रंथों में नूह नाम के एक पैगंबर का ज़िक्र मिलता है। उनका असली नाम लशकर था, लेकिन अरब ने उनको नूह के लकब से याद किया है। वह इसलिए कि आप सारी उम्र रोते रहे। इसका कारण एक ज़ख्मी कुत्ता था। नूह के सामने से एक बार एक घायल कुत्ता गुज़रा। नूह ने उसे दुतकारते हुए कहा, ‘दूर हो जा गंदे कुत्ते!’ इस्लाम में कुत्तों को गंदा समझा जाता है। कुत्ते ने उनकी दुतकार सुनकर जवाब दिया, ‘न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान हो। बनाने वाला सबका तो वही एक है।’
🔤 कठिन शब्दार्थ
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शब्द |
अर्थ |
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पावन |
पवित्र |
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ग्रंथ |
धार्मिक/महत्वपूर्ण पुस्तक |
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पैगंबर |
ईश्वर का संदेश देने वाला धार्मिक पुरुष |
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ज़िक्र |
उल्लेख |
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असली नाम |
वास्तविक नाम |
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लकब |
उपनाम/विशेष नाम |
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ज़ख्मी |
घायल |
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दुतकारना |
झिड़कना, बुरा-भला कहकर दूर करना |
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मर्ज़ी |
इच्छा |
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पसंद |
इच्छा/चयन |
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बनाने वाला |
सृष्टि की रचना करने वाला |
📌 प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश निदा फ़ाज़ली के पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने नूह नामक पैगंबर और एक घायल कुत्ते के प्रसंग के माध्यम से सभी जीवों के प्रति समानता और संवेदना का भाव प्रस्तुत किया है।
📝 सरल अर्थ
लेखक बताता है कि बाइबिल और अन्य पवित्र ग्रंथों में नूह नाम के एक पैगंबर का उल्लेख मिलता है। पाठ के अनुसार उनका वास्तविक नाम लशकर था, लेकिन उन्हें नूह के नाम से याद किया गया क्योंकि वे पूरी जिंदगी रोते रहे।
उनके रोने का कारण एक घायल कुत्ता बताया गया है। एक बार नूह के सामने से एक घायल कुत्ता गुजरा। नूह ने उसे देखकर उसे दुतकारते हुए कहा कि दूर हट जाओ, गंदे कुत्ते।
कुत्ते ने नूह की बात का उत्तर देते हुए एक बहुत गहरी बात कही—न तो मैंने अपनी इच्छा से कुत्ते का रूप चुना है और न आपने अपनी इच्छा से मनुष्य का रूप चुना है। दोनों को बनाने वाला एक ही है।
अर्थात् किसी जीव के रूप, जाति या स्थिति के आधार पर उसे नीचा समझना उचित नहीं है। सभी जीव एक ही सृष्टिकर्ता की रचना हैं।
💡 महत्वपूर्ण बातें
- नूह का उल्लेख बाइबिल और अन्य पवित्र ग्रंथों में मिलता है।
- पाठ में उनके असली नाम के रूप में लशकर का उल्लेख है।
- एक घायल कुत्ते की घटना से उनके जीवन में करुणा का प्रसंग जुड़ा है।
- नूह ने कुत्ते को दुतकार दिया था।
- कुत्ते ने अपने उत्तर से सृष्टि की समानता का महत्वपूर्ण संदेश दिया।
- कोई भी जीव अपनी इच्छा से अपना रूप या जन्म नहीं चुनता।
- सभी जीवों का सृष्टिकर्ता एक ही है।
- यह प्रसंग जीवों के प्रति संवेदना और समान दृष्टि रखने की प्रेरणा देता है।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. नूह कौन थे?
उत्तर: नूह एक पैगंबर थे, जिनका उल्लेख बाइबिल और अन्य पवित्र ग्रंथों में मिलता है।
प्रश्न 2. नूह के रोने का कारण क्या था?
उत्तर: पाठ के अनुसार नूह के रोने का कारण एक घायल कुत्ता था, जिसे देखकर उनके मन में संवेदना उत्पन्न हुई।
प्रश्न 3. नूह ने कुत्ते को क्या कहा?
उत्तर: नूह ने कुत्ते को दुतकारते हुए कहा— “दूर हो जा गंदे कुत्ते!”
प्रश्न 4. कुत्ते ने नूह को क्या उत्तर दिया?
उत्तर: कुत्ते ने कहा कि न तो वह अपनी इच्छा से कुत्ता है और न नूह अपनी पसंद से इंसान हैं। बनाने वाला सबका एक ही है।
प्रश्न 5. कुत्ते के कथन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य संदेश है कि सभी जीव एक ही सृष्टिकर्ता की रचना हैं। इसलिए किसी जीव को उसके रूप या स्थिति के कारण नीचा नहीं समझना चाहिए।
⭐ इस गद्यांश की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति
“न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान हो। बनाने वाला सबका तो वही एक है।”
इसका भावार्थ
मनुष्य को अपने मनुष्य होने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और किसी दूसरे जीव को उसके रूप के कारण तुच्छ नहीं समझना चाहिए। सभी प्राणियों की रचना एक ही सृष्टिकर्ता ने की है।
📜 इसीमें आगे दी गई कविता
मुद्दी से मुट्ठी मिले,
खो के सभी निशाना।
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचाना।
🌸 भावार्थ
कवि कहना चाहता है कि मनुष्य को केवल उसके बाहरी रूप, व्यवहार या दिखाई देने वाली स्थिति से पहचानना आसान नहीं है। हर व्यक्ति के भीतर कितनी संवेदना, अच्छाई, बुराई या मानवता छिपी है, यह तुरंत समझ पाना कठिन होता है।
जैसे मुट्ठी बंद होने पर उसके अंदर क्या है, यह दिखाई नहीं देता, उसी तरह किसी इंसान के मन के भीतर क्या चल रहा है, इसे केवल बाहर से देखकर नहीं जाना जा सकता।
कवि यह सवाल उठाता है कि किस व्यक्ति में कितना अपनापन, करुणा और मानवता है तथा कौन वास्तव में दूसरों के दुख को समझता है—इसकी पहचान कैसे की जाए?
💡 कविता का मुख्य भाव
इस कविता के माध्यम से मानवीय संवेदना, करुणा और दूसरों के दुख को समझने की क्षमता पर विचार किया गया है। कवि बताता है कि आज के समय में लोगों के बीच संवेदनशीलता कम होती जा रही है और व्यक्ति को उसके बाहरी व्यवहार से नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति उसके व्यवहार और संवेदना से पहचानना चाहिए।
एक लाइन में:
👉 सच्ची
मानवता वही है जिसमें इंसान दूसरे के दुख को अपना दुख समझकर उसके प्रति संवेदना
रखे।
📜 गद्यांश–4 :
मूल पाठ
“नूह ने जब उसकी बात सुनी और दुखी हो मुद्दत तक रोते रहे। ‘महाभारत’ में युधिष्ठिर का जो अंत तक साथ निभाता नज़र आता है, वह भी प्रतीकात्मक रूप में एक कुत्ता ही था। सब साथ छोड़ते गए तो केवल वही उनके एकांत को शांत कर रहा था।”
🔤 कठिन शब्दार्थ
· मुद्दत — बहुत लंबे समय तक
· अंत तक — आखिरी समय तक
· प्रतीकात्मक — किसी विशेष भाव या विचार को दर्शाने वाला
· एकांत — अकेलापन
· शांत करना — सुकून देना, मन को संतुष्ट करना
📌 प्रसंग
इस गद्यांश में लेखक नूह और एक घायल कुत्ते की घटना के माध्यम से जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना की बात करता है। इसके बाद महाभारत के युधिष्ठिर का उदाहरण देकर बताता है कि कठिन समय में मनुष्य का साथ छोड़ देने वाले बहुत होते हैं, लेकिन एक पशु भी सच्चा साथी बन सकता है।
📝 सरल अर्थ
नूह ने जब घायल कुत्ते की बात सुनी कि न तो कुत्ता अपनी इच्छा से कुत्ता बना है और न ही नूह अपनी इच्छा से इंसान, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। वे इस बात से इतने दुखी हुए कि लंबे समय तक रोते रहे।
लेखक आगे महाभारत में युधिष्ठिर का उदाहरण देता है। जब युधिष्ठिर अपनी अंतिम यात्रा पर जा रहे थे, तब एक कुत्ता अंत तक उनके साथ बना रहा। रास्ते में दूसरे साथी उनका साथ छोड़ते गए, लेकिन वह कुत्ता उनके साथ चलता रहा और उनके अकेलेपन को दूर करता रहा।
💡 महत्वपूर्ण बातें
1. नूह घायल कुत्ते की बात सुनकर बहुत दुखी हुए।
2. कुत्ते ने नूह को यह समझाया कि सृष्टिकर्ता ने सभी जीवों को बनाया है।
3. युधिष्ठिर के साथ अंत तक एक कुत्ते का रहना निष्ठा और साथ का प्रतीक है।
4. मनुष्य कई बार साथ छोड़ देते हैं, लेकिन पशु भी मनुष्य के सच्चे साथी हो सकते हैं।
5. गद्यांश का मुख्य भाव जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना और करुणा है।
गद्यांश–5 :
📜 मूल पाठ
“दुनिया कैसे वजूद में आई? पहले क्या थी? किस बिंदु से इसकी यात्रा शुरू हुई? इन प्रश्नों के उत्तर विज्ञान अपनी तरह से देता है, धार्मिक ग्रंथ अपनी-अपनी तरह से। संसार की रचना भले ही कैसे हुई हो लेकिन धरती किसी एक की नहीं है। पक्षी, मानव, पशु, नदी, पर्वत, समुद्र आदि की इसमें बराबर की हिस्सेदारी है। यह और बात है कि इस हिस्सेदारी में मानव जाति ने अपनी बुद्धि से बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी कर दी हैं। पहले पूरा संसार एक परिवार के समान था अब टुकड़ों में बैठकर एक-दूसरे से दूर हो चुका है। पहले बड़े-बड़े दालानों-आँगनों में सब मिल-जुलकर रहते थे अब छोटे-छोटे डिब्बे जैसे घरों में जीवन सिमटने लगा है। बढ़ती हुई आबादियों ने समुद्र को पीछे सरकाना शुरू कर दिया है, पेड़ों को रास्तों से हटाना शुरू कर दिया है, फैलते हुए प्रदूषण ने पंछियों को बस्तियों से भगाना शुरू कर दिया है। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया। अब गरमी में ज़्यादा गरमी, बेवक्त की बरसातें, जलजले, सैलाब, तूफ़ान और नित नए रोग, मानव और प्रकृति के इसी असंतुलन के परिणाम हैं। नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बंबई (मुंबई) में देखने को मिला था और यह नमूना इतना डरावना था कि बंबई निवासी डरकर अपने-अपने पूजा-स्थल में अपने खुदाओं से प्रार्थना करने लगे थे।”
🔤 कठिन शब्दार्थ
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शब्द |
अर्थ |
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वजूद |
अस्तित्व |
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बिंदु |
स्थान/अवस्था जहाँ से कोई चीज शुरू हो |
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हिस्सेदारी |
भागीदारी |
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मानव जाति |
मनुष्यों का समुदाय |
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दालान |
घर का बड़ा खुला या अर्ध-खुला भाग |
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आबादी |
जनसंख्या |
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प्रदूषण |
पर्यावरण को दूषित करने वाली स्थिति |
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बारूद |
विस्फोटक पदार्थ; यहाँ युद्ध और विनाश का प्रतीक |
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विनाशलीला |
बड़े पैमाने पर होने वाला विनाश |
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बेवक्त |
असमय |
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जलजला |
भूकंप |
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सैलाब |
बाढ़ |
|
सहनशक्ति |
सहन करने की क्षमता |
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असंतुलन |
संतुलन का बिगड़ना |
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खुदाओं |
ईश्वर/भगवानों |
📌 प्रसंग
इस गद्यांश में लेखक धरती और प्रकृति पर मनुष्य के बढ़ते हस्तक्षेप की चर्चा करता है। लेखक बताता है कि धरती केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि पक्षियों, पशुओं, नदियों, पर्वतों और समुद्रों की भी उतनी ही है। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि और विकास के नाम पर प्रकृति के साथ असंतुलन पैदा कर दिया है।
📝 सरल अर्थ
लेखक कहता है कि दुनिया की शुरुआत कैसे हुई और इसका अस्तित्व कैसे आया, इस बारे में विज्ञान और धार्मिक ग्रंथ अलग-अलग उत्तर देते हैं। लेकिन संसार की उत्पत्ति चाहे जैसे हुई हो, धरती पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं है।
इस धरती पर पशु-पक्षी, नदियाँ, पर्वत, समुद्र और अन्य जीव-जगत का भी उतना ही अधिकार है जितना मनुष्य का। पहले मनुष्य और प्रकृति के बीच अधिक सामंजस्य था। लोग बड़े घरों, आँगनों और खुले स्थानों में मिल-जुलकर रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे बढ़ती आबादी और आधुनिक विकास के कारण मनुष्य ने प्रकृति को अपने अनुसार बदलना शुरू कर दिया।
मनुष्य ने पेड़ों को काटकर रास्ते और इमारतें बनाईं, समुद्र के किनारों तक आबादी फैलाई और प्रदूषण के कारण पक्षियों तथा अन्य जीवों के रहने के स्थान कम कर दिए। युद्ध और बारूद के कारण भी वातावरण को भारी नुकसान पहुँचा।
इन सबका परिणाम आज हमें अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, भूकंप, बाढ़, तूफान और नए-नए रोगों के रूप में देखने को मिलता है।
लेखक अंत में चेतावनी देता है कि प्रकृति की सहन करने की भी एक सीमा होती है। जब मनुष्य प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ करता है तो प्रकृति भी अपना संतुलन बिगड़ने पर विनाशकारी रूप दिखा सकती है। लेखक मुंबई में आए एक डरावने प्राकृतिक संकट का उदाहरण देकर बताता है कि ऐसी स्थिति में लोग भयभीत होकर अपने-अपने ईश्वर से प्रार्थना करने लगे थे।
💡 महत्वपूर्ण बातें
- धरती केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत की साझा संपत्ति है।
- मनुष्य ने अपनी बुद्धि और विकास के कारण प्रकृति के साथ असंतुलन पैदा किया है।
- बढ़ती आबादी के कारण पेड़ों, समुद्र और प्राकृतिक स्थानों पर दबाव बढ़ रहा है।
- प्रदूषण के कारण पक्षियों और अन्य जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं।
- युद्ध और बारूद से वातावरण को नुकसान पहुँचता है।
- अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, बाढ़, तूफान और नए रोगों को लेखक मानव और प्रकृति के असंतुलन का परिणाम बताता है।
- प्रकृति की सहनशक्ति सीमित है।
- इस गद्यांश का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलन और सह-अस्तित्व की भावना से रहना चाहिए।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. धरती पर किन-किन की बराबर की हिस्सेदारी बताई गई है?
उत्तर: धरती पर पक्षी, मानव, पशु, नदी, पर्वत, समुद्र आदि सभी की बराबर की हिस्सेदारी बताई गई है।
प्रश्न 2. मानव जाति ने प्रकृति के साथ क्या किया है?
उत्तर: मानव जाति ने अपनी बुद्धि और विकास के कारण प्रकृति पर हस्तक्षेप बढ़ाया है। उसने पेड़ों को हटाया, समुद्र के किनारों तक आबादी फैलाई और प्रदूषण बढ़ाकर प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।
प्रश्न 3. मानव और प्रकृति के असंतुलन के क्या परिणाम बताए गए हैं?
उत्तर: अधिक गर्मी, असमय वर्षा, जलजले, सैलाब, तूफान और नए-नए रोग मानव और प्रकृति के असंतुलन के परिणाम बताए गए हैं।
प्रश्न 4. “नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है” का क्या आशय
है?
उत्तर: इसका आशय है कि प्रकृति मनुष्य द्वारा किए जा रहे अत्याचार और हस्तक्षेप को हमेशा सहन नहीं कर सकती। एक सीमा के बाद प्रकृति अपना विनाशकारी रूप दिखाकर संतुलन स्थापित करने लगती है।
📖 गद्यांश 7
शीर्षक — जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना और बदलता संसार
📜 मूल पाठ
“ग्वालियर में हमारा एक मकान था, उस मकान के दालान में दो रोशनदान थे। उसमें कबूतर के एक जोड़े ने घोंसला बना लिया था। एक बार बिल्ली ने उचककर दो में से एक अंडा तोड़ दिया। मेरी माँ ने देखा तो उसे दुख हुआ। उसने स्टूल पर चढ़कर दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश की। लेकिन इस कोशिश में दूसरा अंडा उसी के हाथ से गिरकर टूट गया। कबूतर परेशानी में इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे। उनकी आँखों में दुख देखकर मेरी माँ की आँखों में आँसू आ गए। इस गुनाह को ख़ुदा से मुआफ़ कराने के लिए उसने पूरे दिन रोज़ा रखा। दिन-भर कुछ खाया-पिया नहीं। सिर्फ़ रोती रही और बार-बार नमाज़ पढ़-पढ़कर ख़ुदा से इस गलती को मुआफ़ करने की दुआ माँगती रही।
ग्वालियर से बंबई की दूरी ने संसार को काफ़ी कुछ बदल दिया है। वर्सोवा में जहाँ आज मेरा घर है, पहले यहाँ दूर तक जंगल था। पेड़ थे, परिंदे थे और दूसरे जानवर थे। अब यहाँ समंदर के किनारे लंबी-चौड़ी बस्ती बन गई है। इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों-चारिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से कुछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं, उन्होंने यहाँ-वहाँ डेरा डाल लिया है। इनमें से दो कबूतरों ने मेरे फ्लैट के एक मचान में घोंसला बना लिया है। बच्चे अभी छोटे हैं। उनके खिलाने-पिलाने की ज़िम्मेदारी अभी बड़े कबूतरों की है। वे दिन में कई-कई बार आते-जाते हैं। और क्यों न आएँ-जाएँ आखिर उनका भी घर है। लेकिन उनके आने-जाने से हमें परेशानी भी होती है। वे कभी किसी चीज़ को गिराकर तोड़ देते हैं। कभी मेरी लाइब्रेरी में घुसकर कबीर या मिर्ज़ा ग़ालिब को सताने लगते हैं। इस रोज़-रोज़ की परेशानी से तंग आकर मेरी पत्नी ने उस जगह जहाँ उनका आशियाना था, एक जाली लगा दी है, उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया है। उनके आने की खिड़की को भी बंद किया जाने लगा है। खिड़की के बाहर अब दोनों कबूतर रात-भर ख़ामोश और उदास बैठे रहते हैं। मगर अब न सोलोमन है जो उनकी ज़ुबान को समझकर उनका दुख बाँटे, न मेरी माँ है, जो इनके दुखों में सारी रात नमाज़ों में काटे—
नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम।
सूरज ठेकेदार-सा, सबको बाँटे काम।।
🔤 कठिन शब्दार्थ
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कठिन शब्द |
अर्थ |
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दालान |
घर का खुला या अर्ध-खुला भाग |
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रोशनदान |
हवा और रोशनी आने के लिए बनी खिड़की |
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उचककर |
ऊपर की ओर उठकर |
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फड़फड़ाना |
पंखों को तेजी से हिलाना |
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गुनाह |
अपराध/पाप |
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मुआफ़ |
क्षमा |
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रोज़ा |
उपवास |
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दुआ |
प्रार्थना |
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वजूद |
अस्तित्व |
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परिंदे |
पक्षी |
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चारिंदे |
चौपाए/जानवर |
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डेरा डालना |
कहीं ठहर जाना |
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मचान |
ऊँचा बना हुआ स्थान |
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आशियाना |
घर/घोंसला |
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ख़ामोश |
शांत/चुप |
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उदास |
दुखी |
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ज़ुबान |
भाषा |
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दुख बाँटना |
किसी के दुख को समझकर उसमें सहभागी होना |
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सींचना |
पानी देना |
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ठेकेदार |
किसी काम को करने का ठेका लेने वाला व्यक्ति |
📌 प्रसंग
इस गद्यांश में लेखक अपने ग्वालियर के पुराने घर की घटना को याद करता है, जहाँ उसकी माँ कबूतरों के अंडे टूट जाने से बहुत दुखी हो गई थीं। यह घटना उनकी जीव-जंतुओं के प्रति गहरी संवेदना को दर्शाती है।
इसके बाद लेखक वर्तमान समय में मुंबई के वर्सोवा क्षेत्र का वर्णन करता है, जहाँ बढ़ती बस्ती और शहरीकरण के कारण पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक घर छिन गए हैं। लेखक अपने घर में रहने वाले कबूतरों के माध्यम से मनुष्य और पक्षियों के बीच घटते सामंजस्य की ओर ध्यान दिलाता है।
📝 सरल अर्थ
लेखक बताता है कि ग्वालियर में उनके पुराने घर के दालान में कबूतरों ने अपना घोंसला बना रखा था। एक दिन बिल्ली ने उनका एक अंडा तोड़ दिया। लेखक की माँ को यह देखकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्य से वह अंडा भी उनके हाथ से गिरकर टूट गया।
कबूतर बहुत परेशान होकर इधर-उधर फड़फड़ाने लगे। उन्हें दुखी देखकर लेखक की माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें लगा कि उनसे एक जीव के प्रति गलती हो गई है। इस गलती के लिए ईश्वर से क्षमा माँगने के उद्देश्य से उन्होंने पूरे दिन रोज़ा रखा, कुछ खाया-पिया नहीं और नमाज़ पढ़कर बार-बार क्षमा की प्रार्थना की।
इसके बाद लेखक बताता है कि ग्वालियर से मुंबई आने के दौरान संसार में बहुत बदलाव आ गया। जिस वर्सोवा में आज उनका घर है, वहाँ पहले दूर-दूर तक जंगल हुआ करता था। वहाँ पेड़, पक्षी और दूसरे जानवर रहते थे। लेकिन अब वहाँ बड़ी-बड़ी बस्तियाँ बस गई हैं। इन बस्तियों ने अनेक पक्षियों और जानवरों से उनके प्राकृतिक घर छीन लिए हैं।
कुछ पक्षी वहाँ से चले गए, लेकिन जो नहीं जा सके उन्होंने नई जगहों पर अपना ठिकाना बना लिया। लेखक के फ्लैट में भी दो कबूतरों ने एक मचान पर घोंसला बना लिया। उनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और बड़े कबूतर उन्हें खिलाने-पिलाने के लिए बार-बार आते-जाते हैं। लेखक समझता है कि वे आखिर अपने ही घर में आ-जा रहे हैं।
लेकिन कबूतरों के कारण घरवालों को परेशानी भी होती है। वे चीज़ें गिरा देते हैं और कभी-कभी लेखक की लाइब्रेरी में जाकर किताबों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। इस परेशानी से परेशान होकर लेखक की पत्नी ने उनके आशियाने वाली जगह पर जाली लगा दी और उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया। उनकी आने-जाने वाली खिड़की भी बंद कर दी गई।
अब दोनों कबूतर रातभर खिड़की के बाहर चुप और उदास बैठे रहते हैं। लेखक को पुराने समय की याद आती है। वह कहता है कि अब न तो सुलेमान जैसा कोई है जो उनकी भाषा समझकर उनका दुख बाँट सके और न उसकी माँ जैसी कोई है जो उनके दुख को अपना दुख समझकर उनके लिए प्रार्थना करे।
🌸 अंतिम दो पंक्तियों का भावार्थ
“नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम।
सूरज ठेकेदार-सा, सबको बाँटे काम।।“
इन पंक्तियों में प्रकृति के अलग-अलग तत्वों के अपने-अपने कार्य बताए गए हैं। नदी खेतों को पानी देती है, तोता आम खाता है और सूरज सबको अपने-अपने काम के लिए ऊर्जा देता है।
अर्थात् प्रकृति में हर जीव और प्रत्येक प्राकृतिक तत्व की अपनी भूमिका है। किसी को भी बेकार या अनावश्यक समझना उचित नहीं है।
💡 महत्वपूर्ण बातें
- लेखक की माँ जीव-जंतुओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील थीं।
- कबूतर का अंडा टूटने पर माँ ने स्वयं को दोषी मानकर ईश्वर से क्षमा माँगी।
- ग्वालियर के जंगलों की जगह मुंबई में बड़ी-बड़ी बस्तियाँ बस गईं।
- शहरीकरण के कारण पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक आवास कम हो गए।
- कबूतरों ने लेखक के फ्लैट में अपना नया आशियाना बनाया।
- कबूतरों से परेशानी होने के बावजूद लेखक यह मानता है कि उनका भी उस जगह पर रहने का अधिकार है।
- मनुष्य की सुविधा और प्रकृति के अधिकार के बीच संघर्ष इस गद्यांश में दिखाई देता है।
- लेखक को अपनी माँ की संवेदनशीलता की कमी महसूस होती है।
- सुलेमान और लेखक की माँ यहाँ जीव-जंतुओं के दुख को समझने वाली संवेदनशीलता के प्रतीक हैं।
- अंतिम पंक्तियाँ प्रकृति के सह-अस्तित्व और प्रत्येक जीव की उपयोगिता का संदेश देती हैं।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1. लेखक की माँ कबूतर के अंडे टूटने पर क्यों दुखी हुईं?
उत्तर: बिल्ली ने कबूतर का एक अंडा तोड़ दिया था। दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश में वह भी माँ के हाथ से गिरकर टूट गया। कबूतरों को परेशान देखकर माँ को बहुत दुख हुआ और उन्होंने स्वयं को इस घटना के लिए जिम्मेदार समझा।
प्रश्न 2. लेखक की माँ ने अपने गुनाह को माफ कराने के लिए क्या किया?
उत्तर: उन्होंने पूरे दिन रोज़ा रखा, कुछ खाया-पिया नहीं और बार-बार नमाज़ पढ़कर ईश्वर से अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी।
प्रश्न 3. वर्सोवा में पहले और अब क्या अंतर आ गया है?
उत्तर: पहले वर्सोवा में दूर-दूर तक जंगल था। वहाँ पेड़, पक्षी और दूसरे जानवर रहते थे। अब वहाँ समुद्र के किनारे लंबी-चौड़ी बस्ती बन गई है, जिसके कारण अनेक पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक घर छिन गए हैं।
प्रश्न 4. कबूतरों के आने-जाने से लेखक के परिवार को क्या परेशानी होती थी?
उत्तर: कबूतर कभी-कभी घर की चीज़ें गिराकर तोड़ देते थे और लेखक की लाइब्रेरी में घुसकर किताबों को परेशान करते थे। इसी कारण परिवार को असुविधा होती थी।
प्रश्न 5. लेखक की पत्नी ने कबूतरों की समस्या का क्या समाधान किया?
उत्तर: उन्होंने उस जगह पर जाली लगा दी जहाँ कबूतरों ने अपना आशियाना बनाया था। उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया गया और कबूतरों के आने-जाने वाली खिड़की को भी बंद किया जाने लगा।
प्रश्न 6. “मगर अब न सोलोमन है... न मेरी माँ है” से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर: लेखक कहना चाहता है कि अब उसके आसपास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो पक्षियों की भाषा और उनके दुख को समझ सके। उसकी माँ की तरह जीव-जंतुओं के दुख को अपना दुख समझकर उनके लिए प्रार्थना करने वाली संवेदनशीलता भी अब उसे दिखाई नहीं देती।
प्रश्न-अभ्यास
मौखिक
प्रश्न 1. बड़े-बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे क्यों धकेल रहे थे?
उत्तर: बड़े-बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे धकेलकर उसकी जमीन को हथियाना चाहते थे। वे उस जमीन पर निर्माण करके अपने व्यावसायिक लाभ को बढ़ाना चाहते थे।
प्रश्न 2. लेखक का घर किस शहर में था?
उत्तर: लेखक का घर ग्वालियर में था।
प्रश्न 3. जीवन कैसे घोर में सिमटने लगा है?
उत्तर: बढ़ती हुई आबादी और शहरीकरण के कारण बड़े-बड़े खुले स्थान और आँगन समाप्त होते जा रहे हैं। अब जीवन छोटे-छोटे डिब्बे जैसे घरों में सिमटने लगा है।
प्रश्न 4. कबूतर परेशानी में इधर-उधर क्यों फड़फड़ा रहे थे?
उत्तर: बिल्ली द्वारा उनका एक अंडा तोड़ दिए जाने और दूसरा अंडा भी टूट जाने के कारण कबूतर बहुत परेशान और दुखी होकर इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे।
लिखित
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25–30 शब्दों में) लिखिए
प्रश्न 1. अरब में सुलेमान को हजरत सुलेमान के नाम से याद करते हैं?
उत्तर: सुलेमान को अरब में हजरत सुलेमान के नाम से याद किया जाता है। वे सभी जीव-जंतुओं की भाषा समझते थे और उनके प्रति संवेदनशील थे।
प्रश्न 2. लेखक की माँ किस समय पेड़ों के पत्ते तोड़ने के लिए मना करती थीं और क्यों?
उत्तर: लेखक की माँ सूरज ढलने के बाद पेड़ों के पत्ते तोड़ने से मना करती थीं, क्योंकि उनका मानना था कि पेड़ भी जीवित हैं और उन्हें दुख होता है।
प्रश्न 3. प्रकृति में आए असंतुलन का क्या परिणाम हुआ?
उत्तर: प्रकृति के असंतुलन के कारण अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, जलजले, सैलाब, तूफान और नए-नए रोग जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
प्रश्न 4. लेखक की माँ ने पूरे दिन क्या रखा?
उत्तर: लेखक की माँ ने कबूतर का अंडा टूट जाने की गलती के लिए ईश्वर से क्षमा माँगने के उद्देश्य से पूरे दिन रोज़ा रखा और कुछ खाया-पिया नहीं।
प्रश्न 5. लेखक ने ग्वालियर से मुंबई तक किन बदलावों को महसूस किया? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक ने देखा कि जहाँ पहले जंगल, पेड़, पक्षी और जानवर थे, वहाँ अब बड़ी-बड़ी बस्तियाँ बन गई हैं। इससे अनेक जीवों के प्राकृतिक घर छिन गए हैं।
प्रश्न 6. ‘टेसू ढेला’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: नोट: इस प्रश्न का मूल शब्द PDF की छवि में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए स्रोत के आधार पर इसका उत्तर अनुमान से नहीं दिया जा रहा है।
प्रश्न 7. शेख अयाज़ के पिता अब्बू जब काला च्योंटा रेंगता देख भोजन छोड़ कर क्यों उठ खड़े हुए?
उत्तर: शेख अयाज़ के पिता ने काला च्योंटा देखा तो उन्हें लगा कि उन्होंने किसी जीव को उसके घर से बेघर कर दिया है। इसी कारण वे उसे उसके घर छोड़ने चले गए।
लिखित
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50–60 शब्दों में) लिखिए
प्रश्न 1. बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: बढ़ती हुई आबादी के कारण प्राकृतिक स्थानों पर मनुष्य का कब्जा बढ़ता गया। जंगल और पेड़ काटे गए तथा समुद्र के किनारों तक बस्तियाँ बसाई गईं। इससे पक्षियों और पशुओं के प्राकृतिक घर छिन गए। साथ ही प्रदूषण बढ़ने से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा और गर्मी, असमय वर्षा, बाढ़, तूफान तथा नए रोग जैसी समस्याएँ बढ़ीं।
प्रश्न 2. लेखक को पानी की खिड़की में जाली क्यों लगानी पड़ी?
उत्तर: लेखक के घर में दो कबूतरों ने मचान पर घोंसला बना लिया था। वे बार-बार घर में आते-जाते थे और कभी-कभी चीजें गिराकर तोड़ देते थे तथा लेखक की लाइब्रेरी में घुसकर किताबों को परेशान करते थे। रोज-रोज की इस परेशानी से तंग आकर लेखक की पत्नी ने उनके आने-जाने की खिड़की पर जाली लगवा दी।
प्रश्न 3. समुद्र के गुस्से का क्या नतीजा हुआ? उसने अपना गुस्सा कैसे निकाला?
उत्तर: मनुष्य द्वारा समुद्र को लगातार पीछे धकेले जाने से समुद्र का क्षेत्र सिमटता गया। अंततः उसका गुस्सा भयंकर रूप में सामने आया। उसने अपनी लहरों पर दौड़ते हुए तीन जहाजों को उठाकर बच्चों की गेंद की तरह अलग-अलग दिशाओं में फेंक दिया। जहाज वर्ली, बांद्रा और गेट-वे-ऑफ इंडिया के पास जाकर क्षतिग्रस्त हो गए।
प्रश्न 4.
“मुद्दी से मुट्ठी मिले,
खो के सभी निशाना।
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचानना।”
इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि मनुष्य के भीतर कितनी संवेदना और करुणा है, इसे बाहरी रूप से पहचानना कठिन है। जैसे बंद मुट्ठी के अंदर क्या है, यह दिखाई नहीं देता, वैसे ही व्यक्ति के मन की भावनाओं को आसानी से नहीं पहचाना जा सकता।
लिखित
(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए
प्रश्न 1. नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बंबई में देखने को मिला था।
उत्तर: इस कथन का आशय है कि प्रकृति मनुष्य द्वारा किए जा रहे अत्याचार को हमेशा सहन नहीं कर सकती। जब मनुष्य प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ करता है और प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ता है, तो प्रकृति विनाशकारी रूप धारण कर सकती है। मुंबई में समुद्र को पीछे धकेलने के बाद समुद्र का भयंकर रूप इसी बात का उदाहरण है।
प्रश्न 2. “जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही कम गुस्सा आता है।”
उत्तर: इस कथन का आशय है कि महान और शक्तिशाली व्यक्ति सामान्यतः धैर्यवान होता है और छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित नहीं होता। लेकिन जब उसकी सहनशक्ति की सीमा समाप्त हो जाती है, तब उसका क्रोध बहुत प्रभावशाली और रोक पाना कठिन हो सकता है।
प्रश्न 3. “इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों-चारिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से कुछ शहर छोड़कर चले गए हैं, जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ-वहाँ डेरा डाल लिया है।”
उत्तर: लेखक कहना चाहता है कि मनुष्य ने अपनी बढ़ती आबादी और बस्तियों के विस्तार के कारण पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक आवास नष्ट कर दिए हैं। जिन जीवों के घर छिन गए, उनमें से कुछ दूसरी जगह चले गए और जो नहीं जा सके, उन्होंने नई जगहों पर अपना ठिकाना बना लिया।
प्रश्न 4. शेख अयाज़ के पिता बोले, “नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।” इस गद्यांश में छिपी हुई भावना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कथन में जीव-जंतुओं के प्रति गहरी संवेदना और करुणा की भावना छिपी है। शेख अयाज़ के पिता ने च्योंटे को अपने घर से दूर कर दिया था। उन्हें इसका एहसास हुआ तो उन्होंने भोजन छोड़ दिया और च्योंटे को उसके घर वापस छोड़ने चले गए।
भाषा-अध्ययन
प्रश्न 1. उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित वाक्यों में कारक चिह्नों को पहचानकर रेखांकित कीजिए और उनके नाम किस स्थान में लिखिए।
(क) माँ ने भोजन परोसा।
उत्तर: ने — कर्ता कारक
(ख) मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं हूँ।
उत्तर: के लिए — संप्रदान कारक
(ग) मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया।
उत्तर: को — कर्म कारक
(घ) कबूतर परेशानी में इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे।
उत्तर: में — अधिकरण कारक
(ङ) दरिया पर जाओ तो उसे सलाम किया करो।
उत्तर: पर — अधिकरण कारक
प्रश्न 2. नीचे दिए गए पशु शब्दों के बहुवचन रूप लिखिए।
उत्तर:
- चूहा — चूहे
- घोड़ा — घोड़े
- आवाज़ — आवाज़ें
- बिल्ली — बिल्लियाँ
- फूल — फूल
- नदी — नदियाँ
- परिंदा — परिंदे
- कुर्सी — कुर्सियाँ
- सज़ा — सज़ाएँ
- नाज़ — नाज़
- जरा — जराएँ
- तेज — तेज़
प्रश्न 3. ध्यान दीजिए, इन शब्दों में एक ही शब्द के अर्थ में परिवर्तन हो जाता है।
उत्तर: इस प्रश्न में दिए गए शब्दों के अर्थ उनके प्रयोग के अनुसार बदलते हैं। जैसे “डरा” शब्द किसी को भयभीत करने के अर्थ में तथा “डर” भय की स्थिति के अर्थ में प्रयुक्त हो सकता है। इसी प्रकार पाठ में आए शब्दों का अर्थ उनके संदर्भ के अनुसार समझना चाहिए।
शब्द-प्रयोग
प्रश्न 4. निम्नलिखित वाक्यों में उचित शब्द भरकर वाक्य पूरे कीजिए।
(क) आजकल __________ बहुत खराब है। (ज़माना/जमाना)
उत्तर: आजकल ज़माना बहुत खराब है।
(ख) पूरे कमरे को __________ दो। (सज़ा/सजा)
उत्तर: पूरे कमरे को सजा दो।
(ग) __________ चीनी तो देना। (जरा/ज़रा)
उत्तर: ज़रा चीनी तो देना।
(घ) माँ दही __________ भूल गई। (जमाना/ज़माना)
उत्तर: माँ दही जमाना भूल गई।
(ङ) दोषी को __________ दी गई। (सज़ा/सजा)
उत्तर: दोषी को सज़ा दी गई।
(च) महात्मा के चेहरे पर __________ था। (तेज/तेज़)
उत्तर: महात्मा के चेहरे पर तेज़ था।
योग्यता विस्तार
प्रश्न 1. पशु-पक्षी एवं वन्य संरक्षण केंद्रों में जाकर पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रुषा के संबंध में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर: पशु-पक्षी एवं वन्य संरक्षण केंद्रों में घायल, बीमार और असहाय पशु-पक्षियों की देखभाल की जाती है। वहाँ उनके भोजन, उपचार और सुरक्षित रहने की व्यवस्था की जाती है। ऐसे केंद्रों से हमें पशु-पक्षियों के संरक्षण और उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार की जानकारी मिलती है।
परियोजना कार्य
प्रश्न 1. अपने आसपास प्रतिवर्ष एक पौधा लगाइए और उसकी समुचित देखभाल कर पर्यावरण में आए असंतुलन को रोकने में अपना योगदान दीजिए।
उत्तर: प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिवर्ष कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसकी नियमित देखभाल करनी चाहिए। पौधे को समय पर पानी देना, उसकी सुरक्षा करना और आवश्यकता के अनुसार खाद देना चाहिए। इससे हरियाली बढ़ेगी, पर्यावरण संतुलित रहेगा और प्रदूषण कम करने में सहायता मिलेगी।
प्रश्न 2. किसी ऐसी घटना का वर्णन कीजिए जब अपने मनोरंजन के लिए मानव द्वारा पशु-पक्षियों का उपयोग किया गया हो।
उत्तर: कई बार मनोरंजन के लिए पशु-पक्षियों को पिंजरे में बंद करके लोगों के सामने प्रदर्शित किया जाता है। सर्कस और कुछ अन्य स्थानों पर भी पशुओं से विभिन्न करतब करवाए जाते रहे हैं। ऐसी घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि मनोरंजन के लिए पशु-पक्षियों को कष्ट देना उचित है या नहीं।
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