सीताराम सेकसरिया — डायरी का एक पन्ना (Sitaram Seksaria — Diary Ka Ek Panna)

 

सीताराम सेकसरिया डायरी का एक पन्ना (Sitaram Seksaria — Diary Ka Ek Panna) Class 10 Hindi

 


✍️ सीताराम सेकसरिया : जीवन परिचय

सीताराम सेकसरिया हिंदी साहित्य के ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने साहित्य के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उनका जन्म 1892 में राजस्थान के नवलगढ़ में हुआ था। उनके जीवन का अधिकांश समय कलकत्ता (कोलकाता) में बीता।

व्यापार-व्यवसाय से जुड़े होने के बावजूद सीताराम सेकसरिया का साहित्य और समाज-सेवा के प्रति गहरा लगाव था। वे अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक और नारी-शिक्षण संस्थाओं के प्रेरक, संस्थापक और संचालक रहे। इस प्रकार उन्होंने केवल साहित्य के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

महात्मा गांधी के आह्वान पर वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। वे गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के निकट रहे। सत्याग्रह आंदोलन के दौरान उन्होंने जेल-यात्रा भी की। कुछ समय तक वे आजाद हिंद फ़ौज के मंत्री भी रहे।

भारत सरकार ने उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें 1962 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया।

सीताराम सेकसरिया को विद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने स्वाध्याय से पढ़ना-लिखना सीखा। उनके जीवन की यह विशेषता बताती है कि औपचारिक शिक्षा के अभाव के बावजूद व्यक्ति अपने प्रयास और लगन से ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

उनकी उल्लेखनीय कृतियों में स्मृतिकण’, ‘मन की बात’, ‘बीता युग’, ‘नयी यादऔर दो भागों में एक कार्यकर्ता की डायरी प्रमुख हैं। डायरी का एक पन्ना उनकी डायरी-लेखन शैली का महत्वपूर्ण अंश है।


📚 डायरी का एक पन्ना पाठ का परिचय

डायरी का एक पन्ना सीताराम सेकसरिया की डायरी का एक अंश है। इसमें 26 जनवरी 1931 को कलकत्ता में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस का आँखों देखा वर्णन मिलता है।

इस दिन अंग्रेज़ी शासन के विरोध में लोगों ने बड़े उत्साह के साथ राष्ट्रीय झंडा फहराया, जुलूस निकाले और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा की। अंग्रेज़ सरकार ने इस आयोजन को रोकने के लिए भारी पुलिस बल लगाया था।

पुलिस ने लोगों पर लाठियाँ चलाईं, अनेक लोगों को गिरफ्तार किया और कई लोग घायल हुए। इसके बावजूद स्त्रियों, विद्यार्थियों और अन्य देशभक्तों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया।

इस पाठ के माध्यम से उस समय के राष्ट्रीय उत्साह, देशभक्ति, अंग्रेज़ी शासन के दमन और स्वतंत्रता सेनानियों के साहस का सजीव चित्र सामने आता है।


 

📜 गद्यांश–1

26 जनवरी 1931 — स्वतंत्रता दिवस की तैयारियाँ

मूल गद्यांश

26 जनवरी : आज का दिन तो अमर दिन है। आज के ही दिन सारे हिंदुस्तान में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था और इस वर्ष भी उसकी पुनरावृत्ति थी जिसके लिए काफ़ी तैयारियाँ पहले से ही की गई थीं। गत वर्ष अपना हिस्सा बहुत साधारण था। इस वर्ष जितना अपने से बन सकते थे, दिया था। केवल प्रचार में दो हज़ार रुपया खर्च किया गया था। सारे काम का भार अपने समझते थे अपने ऊपर है, और इसी तरह जो कार्यकर्ता थे उनके घर जा-जाकर समझाया था।

बड़े बाज़ार के प्रायः मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा था और कई मकान तो ऐसे सजाए गए थे कि ऐसा मालूम होता था कि मानो स्वतंत्रता मिल गई हो। कलकत्ता के प्रत्येक भाग में ही झंडे लगाए गए थे। जिस रास्ते से मनुष्य जाते थे उसी रास्ते में उत्साह और नवीनता मालूम होती थी। लोगों का कहना था कि ऐसी सजावट पहले नहीं हुई। पुलिस भी अपनी पूरी ताकत से शहर में गश्त देकर प्रदर्शन कर रही थी। मोटर लारियों में गोरखे तथा सारजेंट प्रत्येक मोड़ पर तैनात थे। कितनी ही लारियाँ शहर में घुमाई जा रही थीं। घुड़सवारों का प्रबंध था। कहीं भी ट्रैफिक पुलिस नहीं थी, सारी पुलिस को इसी काम में लगाया गया था। बड़े-बड़े पार्कों तथा मैदानों को पुलिस ने सवेरे से ही घेर लिया था।

मोनुमेंट के नीचे जहाँ शाम को सभा होने वाली थी उस जगह को तो भोर में छह बजे से ही पुलिस ने बड़ी संख्या में घेर लिया था, पर तब भी कई जगह तो भोर में ही झंडा फहराया गया। श्रद्धानंद पार्क में बंगाल प्रांतीय विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू ने झंडा गाड़ा तो पुलिस ने उनको पकड़ लिया तथा और लोगों को मारा या हटा दिया।


🔤 कठिन शब्दार्थ

कठिन शब्द

अर्थ

अमर दिन

हमेशा याद रहने वाला दिन

पुनरावृत्ति

दोबारा होना

प्रचार

किसी बात को लोगों तक पहुँचाना

कार्यकर्ता

किसी कार्य में सक्रिय रूप से काम करने वाला व्यक्ति

राष्ट्रीय झंडा

देश का ध्वज

नवीनता

नया उत्साह/नयापन

गश्त

सुरक्षा के लिए घूमना

सार्जेंट

पुलिस का एक अधिकारी

तैनात

नियुक्त/लगाया हुआ

घुड़सवार

घोड़े पर सवार सैनिक/पुलिसकर्मी

मोनुमेंट

स्मारक

भोर

सुबह का बहुत प्रारंभिक समय

प्रांतीय

प्रांत से संबंधित

झंडा गाड़ना

झंडा स्थापित करना


📌 प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश सीताराम सेकसरिया की डायरी डायरी का एक पन्ना से लिया गया है। इसमें लेखक ने 26 जनवरी 1931 को कलकत्ता में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों और उस दिन के वातावरण का वर्णन किया है।


📝 सरल अर्थ

लेखक 26 जनवरी 1931 को एक ऐतिहासिक और अमर दिन मानता है। वह बताता है कि पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था। इस बार इसके लिए पहले से बहुत अधिक तैयारियाँ की गई थीं। स्वतंत्रता दिवस के प्रचार पर लगभग दो हजार रुपये खर्च किए गए थे और कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर कार्यक्रम के लिए तैयार किया गया था।

कलकत्ता के बड़े बाजार और अन्य क्षेत्रों में लगभग हर मकान पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया था। कई मकानों को इतनी सुंदरता से सजाया गया था कि ऐसा लगता था जैसे देश को स्वतंत्रता मिल चुकी हो।

पूरे कलकत्ता में उत्साह का वातावरण था। लोगों को चारों ओर एक नया जोश और उमंग दिखाई दे रही थी। लेकिन अंग्रेज़ी सरकार ने इस आयोजन को रोकने के लिए शहर में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया था। पुलिस की गाड़ियाँ, घुड़सवार और अधिकारी जगह-जगह मौजूद थे।

जिस मैदान में शाम को सभा होनी थी, उसे पुलिस ने सुबह छह बजे से ही घेर लिया था। इसके बावजूद देशभक्त लोग पीछे नहीं हटे। कई स्थानों पर सुबह-सुबह ही राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया गया।

श्रद्धानंद पार्क में बंगाल प्रांतीय विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू ने झंडा फहराया तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तथा अन्य लोगों को भी मारा या वहाँ से हटा दिया।


💡 महत्वपूर्ण बातें

1.   26 जनवरी 1931 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

2.   पूरे कलकत्ता में राष्ट्रीय उत्साह का वातावरण था।

3.   मकानों पर राष्ट्रीय झंडे लगाए गए थे।

4.   स्वतंत्रता दिवस के प्रचार पर दो हजार रुपये खर्च किए गए।

5.   अंग्रेज़ी सरकार ने कार्यक्रम को रोकने के लिए भारी पुलिस बल लगाया।

6.   पुलिस ने पार्कों और मैदानों को पहले ही घेर लिया था।

7.   पुलिस के विरोध के बावजूद लोगों ने झंडा फहराया।

8.   अविनाश बाबू को झंडा फहराने के कारण गिरफ्तार किया गया।


 

📜 गद्यांश–2

तारा सुंदरी पार्क और छात्राओं का झंडोत्सव

मूल गद्यांश

तारा सुंदरी पार्क में बड़ा-बाज़ार कांग्रेस कमेटी के मंत्री हरिश्चंद्र सिंह झंडा फहराने गए पर वे भीतर न जा सके। वहाँ पर काफ़ी मारपीट हुई और दो-चार आदमियों के सिर फट गए। गुजराती सेविका संघ की ओर से जुलूस निकला जिसमें बहुत-सी लड़कियाँ थीं। उनको गिरफ्तार कर लिया।

11 बजे मारवाड़ी बालिका विद्यालय की लड़कियों ने अपने विद्यालय में झंडोत्सव मनाया। जानकीदेवी, मदालसा आदि भी गई थीं। लड़कियों को, उत्सव का क्या मतलब है, समझाया गया। एक बार मोटर में बैठकर सब तरफ घूमकर देखा तो बहुत अच्छा मालूम हो रहा था। जगह-जगह फोटो उतर रहे थे। अपने भी फोटो का काफ़ी प्रबंध किया था। दो-तीन बजे कई आदमियों को पकड़ लिया गया, जिसमें मुख्य पूर्णादास और पुरुषोत्तम राय थे।


🔤 कठिन शब्दार्थ

शब्द

अर्थ

मारपीट

एक-दूसरे को मारना

जुलूस

लोगों का समूह जो किसी उद्देश्य से साथ चलता है

गिरफ्तार

बंदी बना लेना

झंडोत्सव

झंडा फहराकर मनाया जाने वाला उत्सव

प्रबंध

व्यवस्था

मुख्य

प्रमुख


📌 प्रसंग

इस गद्यांश में लेखक ने तारा सुंदरी पार्क में झंडा फहराने के प्रयास, पुलिस की मारपीट और छात्राओं द्वारा स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने का वर्णन किया है।


📝 सरल अर्थ

तारा सुंदरी पार्क में हरिश्चंद्र सिंह राष्ट्रीय झंडा फहराने गए, लेकिन पुलिस ने उन्हें अंदर जाने नहीं दिया। वहाँ पुलिस और लोगों के बीच मारपीट हुई और कुछ लोगों के सिर फट गए।

गुजराती सेविका संघ की ओर से भी एक जुलूस निकाला गया जिसमें बड़ी संख्या में लड़कियाँ शामिल थीं। पुलिस ने उन लड़कियों को भी गिरफ्तार कर लिया।

इसके बाद सुबह 11 बजे मारवाड़ी बालिका विद्यालय की छात्राओं ने अपने विद्यालय में झंडोत्सव मनाया। वहाँ जानकीदेवी और मदालसा जैसी महिलाएँ भी उपस्थित थीं। छात्राओं को स्वतंत्रता दिवस के महत्व के बारे में बताया गया।

दोपहर में पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें पूर्णादास और पुरुषोत्तम राय प्रमुख थे।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • पुलिस स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों को रोक रही थी।
  • महिलाओं और लड़कियों ने भी आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
  • छात्राओं ने विद्यालय में झंडोत्सव मनाया।
  • पुलिस ने अनेक लोगों को गिरफ्तार किया।

 

📜 गद्यांश–3

सुभाष बाबू के जुलूस की तैयारी

मूल गद्यांश

सुभाष बाबू के जुलूस का भार पूर्णोदास पर था पर यह प्रबंध कर चुका था। स्त्री समाज अपनी तैयारी में लगा था। जगह-जगह से स्त्रियाँ अपना जुलूस निकालने की तथा ठीक स्थान पर पहुँचने की कोशिश कर रही थीं। मोनुमेंट के पास जैसा प्रबंध भोर में था वैसा करीब एक बजे नहीं रहा। इससे लोगों को आशा होने लगी कि शायद पुलिस अपना रंग न दिखलावे पर वह कब रुकने वाली थी।

तीन बजे से ही मैदान में हजारों आदमियों की भीड़ होने लगी और लोग टोलियाँ बना-बनाकर मैदान में घूमने लगे। आज जो बात थी वह निराली थी। जब से कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान में नहीं की गई थी और यह सभा तो कहना चाहिए कि ओपन लड़ाई थी।


🔤 कठिन शब्दार्थ

  • भारजिम्मेदारी
  • प्रबंधव्यवस्था
  • स्त्री समाजमहिलाओं का समूह
  • जुलूससमूह में निकलना
  • आशाउम्मीद
  • कानून भंगकानून का उल्लंघन
  • निरालीअनोखी
  • सभालोगों का एकत्र होना

📌 प्रसंग

यहाँ लेखक ने सुभाष बाबू के जुलूस और स्वतंत्रता दिवस की सभा की तैयारियों तथा बढ़ती हुई भीड़ का वर्णन किया है।


📝 सरल अर्थ

सुभाष बाबू के जुलूस की जिम्मेदारी पूर्णोदास के पास थी और वह उसकी तैयारी कर चुका था। दूसरी ओर महिलाओं का समूह भी अपने जुलूस की तैयारी में लगा हुआ था।

शुरुआत में मोनुमेंट के पास पुलिस की कड़ी व्यवस्था थी, लेकिन दोपहर तक वहाँ पुलिस का प्रबंध पहले जैसा दिखाई नहीं दे रहा था। इससे लोगों को लगा कि शायद पुलिस अब कार्यक्रम को रोकने का प्रयास नहीं करेगी।

लेकिन दोपहर तीन बजे से ही मैदान में हजारों लोग इकट्ठा होने लगे। लोग छोटी-छोटी टोलियाँ बनाकर मैदान में घूम रहे थे। लेखक के अनुसार उस दिन का वातावरण बिल्कुल अलग और असाधारण था।

कानून भंग आंदोलन शुरू होने के बाद इतनी बड़ी सभा पहले कभी नहीं हुई थी। यह सभा अंग्रेज़ी शासन के सामने एक प्रकार की खुली चुनौती थी।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • सुभाष बाबू के जुलूस की तैयारी पूरी हो चुकी थी।
  • महिलाओं ने भी अलग से जुलूस निकालने की तैयारी की।
  • मैदान में हजारों लोग एकत्र होने लगे।
  • सभा अंग्रेज़ी शासन के लिए खुली चुनौती थी।

 

📜 गद्यांश–4

पुलिस की चेतावनी और खुली चुनौती

मूल गद्यांश

पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकल चुका था कि अमुक-अमुक धारा के अनुसार कोई सभा नहीं हो सकती। जो लोग काम करने वाले थे उन सबको इंस्पेक्टरों के द्वारा नोटिस और सूचना दे दी गई थी कि आप यदि सभा में भाग लेंगे तो दोषी समझे जाएँगे। इधर कौंसिल की तरफ़ से नोटिस निकल गया था कि मोनुमेंट के नीचे ठीक चार बजकर चौबीस मिनट पर झंडा फहराया जाएगा तथा स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी। सर्वसाधारण की उपस्थिति होनी चाहिए। खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।


🔤 कठिन शब्दार्थ

शब्द

अर्थ

नोटिस

सूचना/आधिकारिक चेतावनी

धारा

कानून का विशेष प्रावधान

दोषी

अपराध करने वाला

कौंसिल

परिषद

प्रतिज्ञा

दृढ़ संकल्प

सर्वसाधारण

आम जनता

चैलेंज

चुनौती


📌 प्रसंग

इस अंश में अंग्रेज़ी सरकार द्वारा सभा पर रोक लगाने तथा उसके बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा सभा करने की खुली चुनौती का वर्णन किया गया है।


📝 सरल अर्थ

पुलिस कमिश्नर ने आदेश जारी कर दिया था कि संबंधित कानून की धाराओं के अनुसार कोई सभा नहीं की जा सकती। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों को पुलिस अधिकारियों द्वारा चेतावनी दी गई थी कि यदि वे सभा में शामिल होंगे तो उन्हें दोषी माना जाएगा।

दूसरी ओर, कौंसिल ने घोषणा कर दी कि ठीक चार बजकर चौबीस मिनट पर मोनुमेंट के नीचे राष्ट्रीय झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

इस प्रकार एक तरफ अंग्रेज़ी सरकार सभा रोकने के लिए तैयार थी और दूसरी ओर देशभक्त लोग सभा करने का दृढ़ निश्चय कर चुके थे। इसलिए लेखक इसे अंग्रेज़ी शासन के सामने खुली चुनौती कहता है।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • पुलिस ने सभा पर प्रतिबंध लगाया था।
  • आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किए जाने की चेतावनी दी गई थी।
  • इसके बावजूद झंडा फहराने का कार्यक्रम निश्चित रहा।
  • सभा अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध साहसपूर्ण चुनौती थी।

 

📜 गद्यांश–5

सुभाष बाबू का जुलूस और पुलिस की लाठीचार्ज

मूल गद्यांश

ठीक चार बजकर दस मिनट पर सुभाष बाबू जुलूस लेकर आए। उनको चौरंगी पर ही रोका गया, पर भीड़ की अधिकता के कारण पुलिस जुलूस को रोक नहीं सकी। मैदान के मोड़ पर पहुँचते ही पुलिस ने लाठियाँ चलानी शुरू कर दीं, बहुत आदमी घायल हुए, सुभाष बाबू पर भी लाठियाँ पड़ीं। सुभाष बाबू बहुत जोर से वंदे मातरम् बोल रहे थे। ज्योतिर्मय गांगुली ने सुभाष बाबू से कहा, आप इधर आ जाइए। पर सुभाष बाबू ने कहा, आगे बढ़ना है।


🔤 कठिन शब्दार्थ

  • अधिकताअधिक होना
  • मोड़रास्ते का घुमाव
  • लाठीचार्जपुलिस द्वारा लाठियों से हमला
  • घायलचोट लगने वाला
  • आगे बढ़नापीछे न हटना

📌 प्रसंग

यह गद्यांश उस समय का है जब सुभाष बाबू जुलूस लेकर सभा स्थल की ओर बढ़े और पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज किया।


📝 सरल अर्थ

शाम के कार्यक्रम से कुछ समय पहले, ठीक चार बजकर दस मिनट पर सुभाष बाबू जुलूस लेकर आए। पुलिस ने उन्हें चौरंगी पर रोकने का प्रयास किया, लेकिन जुलूस में बहुत अधिक भीड़ होने के कारण पुलिस उसे रोक नहीं सकी।

जब जुलूस मैदान के मोड़ पर पहुँचा तो पुलिस ने लोगों पर लाठियाँ चलानी शुरू कर दीं। अनेक लोग घायल हुए और सुभाष बाबू को भी लाठियाँ लगीं।

इसके बावजूद सुभाष बाबू जोर-जोर से वंदे मातरम् बोलते रहे। ज्योतिर्मय गांगुली ने उन्हें पीछे हटने को कहा, लेकिन सुभाष बाबू ने स्पष्ट कहा कि आगे बढ़ना है।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • सुभाष बाबू नेतृत्व करते हुए जुलूस लेकर आए।
  • पुलिस ने जुलूस को रोकने का प्रयास किया।
  • पुलिस ने लाठीचार्ज किया।
  • सुभाष बाबू घायल होने के बावजूद पीछे नहीं हटे।
  • उनके नेतृत्व में साहस और देशभक्ति दिखाई देती है।

 

📜 गद्यांश–6

पुलिस की हिंसा और महिलाओं का साहस

मूल गद्यांश

यह सब तो अपने सुनी हुई लिख रहे हैं पर सुभाष बाबू का और अपना विशेष फ़ासला नहीं था। सुभाष बाबू बड़े जोर से वंदे मातरम् बोलते थे, यह अपनी आँख से देखा। पुलिस भयानक रूप से लाठियाँ चला रही थी। क्षितीश चटर्जी का फटा हुआ सिर देखकर तथा उसका बहता हुआ खून देखकर आँख मिंच जाती थी। इधर यह हालत हो रही थी कि उधर स्त्रियाँ मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़ झंडा फहरा रही थीं और घोषणा पढ़ रही थीं। स्त्रियाँ बहुत बड़ी संख्या में पहुँच गई थीं। प्रायः सबके पास झंडा था। जो वालेंटियर गए थे वे अपने स्थान से लाठियाँ पड़ने पर भी हटते नहीं थे।


🔤 कठिन शब्दार्थ

शब्द

अर्थ

फ़ासला

दूरी

भयानक

बहुत डरावना

लाठी

पुलिस द्वारा प्रयुक्त डंडा

घोषणा

सार्वजनिक रूप से कही गई बात

वालेंटियर

स्वयंसेवक

स्थान

जगह

फहरा रही थीं

लहरा रही थीं


📌 प्रसंग

लेखक पुलिस की हिंसा का आँखों देखा वर्णन करते हुए बताता है कि उसी समय महिलाएँ और स्वयंसेवक अत्यंत साहस के साथ राष्ट्रीय झंडा फहरा रहे थे।


📝 सरल अर्थ

लेखक बताता है कि उसने स्वयं सुभाष बाबू को जोर-जोर से वंदे मातरम् कहते हुए देखा था। पुलिस बहुत बेरहमी से लोगों पर लाठियाँ बरसा रही थी। क्षितीश चटर्जी का सिर फट गया था और खून बह रहा था।

लेकिन दूसरी ओर महिलाएँ भी बड़ी संख्या में मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़कर राष्ट्रीय झंडा फहरा रही थीं और स्वतंत्रता की घोषणा पढ़ रही थीं।

स्वयंसेवक भी पुलिस की लाठियाँ खाने के बावजूद अपने स्थान से हट नहीं रहे थे। इससे उस समय के आंदोलनकारियों के अद्भुत साहस और दृढ़ निश्चय का पता चलता है।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • पुलिस ने अत्यंत कठोरता से लाठीचार्ज किया।
  • क्षितीश चटर्जी घायल हुए।
  • महिलाओं ने भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
  • स्वयंसेवक लाठी खाने के बावजूद पीछे नहीं हटे।
  • यह अंश देशभक्तों के साहस को दर्शाता है।

 

📜 गद्यांश–7

सुभाष बाबू की गिरफ्तारी और महिलाओं का जुलूस

मूल गद्यांश

सुभाष बाबू को पकड़ लिया गया और गाड़ी में बैठाकर लालबाजार लॉकअप में भेज दिया गया। कुछ देर बाद ही स्त्रियाँ जुलूस बनाकर वहाँ से चलीं। साथ में बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई। बीच में पुलिस कुछ ठंडी पड़ी थी, उसने फिर डंडे चलाने शुरू कर दिए। अबकी बार भीड़ ज्यादा होने के कारण बहुत आदमी घायल हुए। धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस टूट गया और करीब 50-60 स्त्रियाँ वहीं मोड़ पर बैठ गईं। पुलिस ने उनको पकड़कर लालबाजार भेज दिया। स्त्रियों का एक भाग आगे बढ़ा जिसका नेतृत्व विमल प्रतिभा कर रही थीं। उनको बहू बाजार के मोड़ पर रोका गया और वे वहीं मोड़ पर बैठ गईं। आस-पास बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई, जिस पर पुलिस बीच-बीच में लाठी चलाती थी।


🔤 कठिन शब्दार्थ

  • लॉकअपपुलिस की हिरासत का स्थान
  • जुलूससमूह में निकली यात्रा
  • इकट्ठीएकत्र
  • धर्मतल्लाकलकत्ता का एक स्थान
  • नेतृत्वमार्गदर्शन
  • हिरासतपुलिस की निगरानी में रखना

📌 प्रसंग

इस अंश में सुभाष बाबू की गिरफ्तारी के बाद महिलाओं द्वारा निकाले गए जुलूस और पुलिस द्वारा उन पर किए गए दमन का वर्णन है।


📝 सरल अर्थ

पुलिस ने सुभाष बाबू को गिरफ्तार करके लालबाजार के लॉकअप में भेज दिया। इसके कुछ समय बाद महिलाओं ने जुलूस निकाला। उनके साथ बहुत बड़ी भीड़ भी हो गई।

पुलिस ने पहले कुछ समय तक कोई कार्रवाई नहीं की, लेकिन बाद में उसने फिर से लाठियाँ चलानी शुरू कर दीं। भीड़ अधिक होने के कारण अनेक लोग घायल हुए।

धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस टूट गया और लगभग 50–60 महिलाएँ वहीं बैठ गईं। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

महिलाओं का एक दूसरा समूह विमल प्रतिभा के नेतृत्व में आगे बढ़ा। पुलिस ने उन्हें बहू बाजार के मोड़ पर रोक दिया। वे वहीं बैठ गईं। आसपास बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गई, जिस पर पुलिस बीच-बीच में लाठीचार्ज करती रही।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • सुभाष बाबू गिरफ्तार कर लिए गए।
  • महिलाओं ने आंदोलन जारी रखा।
  • लगभग 50–60 महिलाओं को गिरफ्तार किया गया।
  • विमल प्रतिभा ने महिलाओं के दूसरे समूह का नेतृत्व किया।
  • पुलिस ने भीड़ पर भी लाठीचार्ज किया।

 

📜 गद्यांश–8

105 महिलाओं की गिरफ्तारी

मूल गद्यांश

इस प्रकार करीब पौन घंटे के बाद पुलिस की लारी आई और उनको लालबाजार ले जाया गया। और भी कई आदमियों को पकड़ा गया। वृजलाल गोयनका जो कई दिन से अपने साथ काम कर रहा था और दमदम जेल में भी अपने साथ था, पकड़ा गया। पहले तो वह झंडा लेकर वंदे मातरम् बोलता हुआ मोनुमेंट की ओर इतने जोर से दौड़ा कि अपने आप ही गिर पड़ा और उसे एक अंग्रेजी घुड़सवार ने लाठी मारी फिर पकड़कर कुछ दूर ले जाने के बाद छोड़ दिया। इस पर वह स्त्रियों के जुलूस में शामिल हो गया और वहाँ पर भी उसको छोड़ दिया। तब वह दो सौ आदमियों का जुलूस बनाकर लालबाजार गया और वहाँ पर गिरफ्तार हो गया। मदालसा भी पकड़ी गई थी। उससे मालूम हुआ कि उसको थाने में भी मारा था। सब मिलाकर 105 स्त्रियाँ पकड़ी गई थीं। बाद में रात को नौ बजे सबको छोड़ दिया गया।


🔤 कठिन शब्दार्थ

शब्द

अर्थ

पौन घंटे

लगभग 45 मिनट

लारी

बड़ी मोटर गाड़ी

घुड़सवार

घोड़े पर सवार पुलिसकर्मी

जुलूस

समूह में चलने वाले लोग

थाना

पुलिस कार्यालय

पकड़ा गया

गिरफ्तार किया गया


📌 प्रसंग

यहाँ लेखक ने आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी और विशेष रूप से 105 महिलाओं की गिरफ्तारी का वर्णन किया है।


📝 सरल अर्थ

लगभग 45 मिनट बाद पुलिस की गाड़ी आई और महिलाओं को लालबाजार ले जाया गया। इसके अलावा कई अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया।

वृजलाल गोयनका भी गिरफ्तार हुए। उन्होंने झंडा लेकर वंदे मातरम् कहते हुए मोनुमेंट की ओर दौड़ने का प्रयास किया। एक अंग्रेज़ घुड़सवार पुलिसकर्मी ने उन्हें लाठी मारी और पकड़ लिया।

बाद में वे महिलाओं के जुलूस में शामिल हुए और फिर लगभग दो सौ लोगों का जुलूस बनाकर लालबाजार पहुँचे, जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

मदालसा भी गिरफ्तार हुई थीं। उन्होंने बताया कि थाने में भी उनके साथ मारपीट की गई। कुल मिलाकर 105 महिलाओं को गिरफ्तार किया गया। रात नौ बजे उन्हें छोड़ दिया गया।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  • पुलिस ने बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया।
  • वृजलाल गोयनका ने साहसपूर्वक झंडा लेकर जुलूस निकाला।
  • मदालसा के साथ थाने में मारपीट हुई।
  • कुल 105 महिलाएँ गिरफ्तार की गईं।
  • रात नौ बजे सभी को छोड़ दिया गया।

 

📜 गद्यांश–9

घायलों की संख्या और आंदोलन की सफलता

मूल गद्यांश

कलकत्ता में आज तक इतनी स्त्रियाँ एक साथ गिरफ्तार नहीं की गई थीं। करीब आठ बजे खादी भंडार आए तो कांग्रेस ऑफिस से फोन आया कि यहाँ बहुत आदमी चोट खाकर आए हैं और कई की हालत संगीन है उनके लिए गाड़ी चाहिए। जानकीदेवी के साथ वहाँ गए, बहुत लोगों को चोट लगी हुई थी। डॉक्टर दासगुप्ता उनकी देख-रेख तथा फोटो उतरवा रहे थे। उस समय तक 67 आदमी वहाँ आ चुके थे। बाद में तो 103 तक आ पहुँचे।

अस्पताल गए, लोगों को देखने से मालूम हुआ कि 160 आदमी तो अस्पतालों में पहुँचे और जो लोग घरों में चले गए, वे अलग हैं। इस प्रकार दो सौ घायल जरूर हुए हैं। पकड़े गए आदमियों की संख्या का पता नहीं चला, पर लालबाजार के लॉकअप में स्त्रियों की संख्या 105 थी। आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया और लोग सोचने लग गए कि यहाँ भी बहुत सा काम हो सकता है।


🔤 कठिन शब्दार्थ

  • संगीनगंभीर
  • देख-रेखनिगरानी/सेवा
  • अस्पतालउपचार का स्थान
  • अपूर्वअसाधारण
  • कलंकबदनामी
  • अंशभाग
  • धुल जानासमाप्त हो जाना
  • काम हो सकता हैआंदोलन में सफलता प्राप्त की जा सकती है

📌 प्रसंग

यह पाठ का अंतिम अंश है। इसमें लेखक ने उस दिन हुई गिरफ्तारियों, घायलों की संख्या और स्वतंत्रता आंदोलन की सफलता का उल्लेख किया है।


📝 सरल अर्थ

लेखक बताता है कि कलकत्ता में इससे पहले एक साथ इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं को गिरफ्तार नहीं किया गया था।

रात के लगभग आठ बजे जब लेखक खादी भंडार पहुँचा तो कांग्रेस कार्यालय से फोन आया कि वहाँ बहुत से घायल लोग आए हैं और कुछ की हालत गंभीर है। उनके लिए गाड़ी की आवश्यकता थी।

जानकीदेवी के साथ लेखक वहाँ गया। वहाँ बहुत से लोग घायल अवस्था में थे। डॉक्टर दासगुप्ता उनकी देखभाल कर रहे थे और घायलों के फोटो भी लिए जा रहे थे। पहले वहाँ 67 घायल पहुँच चुके थे और बाद में यह संख्या 103 हो गई।

अस्पताल जाने पर पता चला कि लगभग 160 लोग अस्पतालों में पहुँचे थे। इसके अतिरिक्त कई घायल लोग अपने घर चले गए थे। इस प्रकार लेखक के अनुसार लगभग 200 लोग घायल हुए

गिरफ्तार किए गए पुरुषों की कुल संख्या का पता नहीं चल पाया, लेकिन लालबाजार लॉकअप में 105 महिलाएँ गिरफ्तार थीं।

लेखक इस दिन की घटना को अपूर्व मानता है। उसका कहना है कि कलकत्ता के बारे में यह धारणा बनी हुई थी कि वहाँ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए पर्याप्त काम नहीं हो रहा है। लेकिन उस दिन के आंदोलन से यह धारणा काफी हद तक समाप्त हो गई और लोगों को विश्वास हुआ कि कलकत्ता में भी स्वतंत्रता आंदोलन के लिए बहुत काम किया जा सकता है।


💡 महत्वपूर्ण बातें

1.   कुल 105 महिलाएँ गिरफ्तार हुईं।

2.   लगभग 200 लोग घायल हुए।

3.   160 लोग अस्पतालों तक पहुँचे।

4.   कांग्रेस कार्यालय में बड़ी संख्या में घायल लोग पहुँचे।

5.   डॉक्टर दासगुप्ता घायलों की देखभाल कर रहे थे।

6.   लेखक ने इस दिन की घटना को अपूर्व बताया।

7.   इस आंदोलन से कलकत्ता में स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रियता सिद्ध हुई।

8.   लोगों के मन में नया उत्साह और विश्वास पैदा हुआ।


 

🌟 पाठ का केंद्रीय भाव

डायरी का एक पन्ना केवल 26 जनवरी 1931 की घटनाओं का विवरण नहीं है, बल्कि यह उस समय के राष्ट्रीय आंदोलन की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता है।

इसमें दिखाया गया है कि अंग्रेज़ी सरकार ने स्वतंत्रता दिवस के आयोजन को रोकने के लिए पुलिस की पूरी ताकत लगा दी, लेकिन देशभक्तों, महिलाओं, विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों का उत्साह कम नहीं हुआ।

लाठियाँ खाकर, गिरफ्तार होकर और घायल होने के बावजूद लोग राष्ट्रीय ध्वज और स्वतंत्रता की भावना से पीछे नहीं हटे।

पाठ का मुख्य संदेश

स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए केवल नेतृत्व ही नहीं, बल्कि आम जनता, महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी, साहस और दृढ़ संकल्प भी आवश्यक है।


 

📖 डायरी का एक पन्ना प्रश्न-अभ्यास के उत्तर

लेखक सीताराम सेकसरिया


🟣 मौखिक

1. कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन क्यों महत्वपूर्ण था?

उत्तर:
26 जनवरी 1931 का दिन कलकत्ता वासियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उस दिन स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था। पूरे शहर में राष्ट्रीय झंडे फहराए गए, जुलूस निकाले गए और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा ली गई।


2. सुभाष बाबू के जुलूस का भार किस पर था?

उत्तर:
सुभाष बाबू के जुलूस का भार पूर्णोदास पर था।


3. विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर:
अविनाश बाबू ने श्रद्धानंद पार्क में झंडा गाड़ा तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया तथा अन्य लोगों को मारा और वहाँ से हटा दिया।


4. लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर किस बात का संकेत देना चाहते थे?

उत्तर:
लोग राष्ट्रीय झंडा फहराकर देश की स्वतंत्रता के प्रति अपनी भावना, अंग्रेज़ी शासन के विरोध तथा स्वतंत्रता प्राप्त करने के दृढ़ संकल्प का संकेत देना चाहते थे।


5. पुलिस ने बड़े-बड़े पार्कों तथा मैदानों को क्यों घेर रखा था?

उत्तर:
पुलिस ने बड़े-बड़े पार्कों और मैदानों को इसलिए घेर रखा था ताकि स्वतंत्रता दिवस की सभाएँ, जुलूस और झंडा फहराने के कार्यक्रम न हो सकें तथा आंदोलनकारियों को नियंत्रित किया जा सके।


🟢 लिखित — (क)

25–30 शब्दों में उत्तर

1. 26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की गईं?

उत्तर:
26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए व्यापक प्रचार किया गया, कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर समझाया गया, मकानों पर राष्ट्रीय झंडे लगाए गए तथा जुलूस और सभा की तैयारियाँ की गईं।


2. “आज जो बात थी वह निराली थी”—किस बात से पता चल रहा था कि आज का दिन अपने आप में निराला है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
पूरे कलकत्ता में असाधारण उत्साह था। हजारों लोग मैदान में एकत्र थे, स्त्रियाँ जुलूस निकाल रही थीं और पुलिस के प्रतिबंध के बावजूद झंडा फहराने तथा सभा करने की तैयारी थी।


3. पुलिस कमिश्नर के नोटिस और कौंसिल के नोटिस में क्या अंतर था?

उत्तर:
पुलिस कमिश्नर के नोटिस में सभा करने पर रोक और भाग लेने वालों को दोषी ठहराने की चेतावनी थी, जबकि कौंसिल के नोटिस में झंडा फहराने और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ने की सूचना थी।


4. धर्मतल्ले के मोड़ पर जुलूस क्यों रुक गया?

उत्तर:
धर्मतल्ले के मोड़ पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और बहुत से लोग घायल हुए। भीड़ तथा पुलिस की कार्रवाई के कारण जुलूस टूट गया और लगभग 50–60 स्त्रियाँ वहीं बैठ गईं।


5. डॉ. दासगुप्ता के अस्पताल पहुँचने से क्या पता चलता है कि वहाँ घायल लोगों की क्या हालत थी?

उत्तर:
घायलों की संख्या बहुत अधिक थी और अनेक की हालत गंभीर थी। डॉक्टर दासगुप्ता उनकी देखभाल कर रहे थे। अस्पतालों में लगभग 160 लोग पहुँचे और कुल करीब 200 लोग घायल हुए।


🟢 लिखित — (ख)

50–60 शब्दों में उत्तर

1. सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी?

उत्तर:
सुभाष बाबू के जुलूस के समय स्त्री समाज भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय था। जगह-जगह से स्त्रियाँ अपने जुलूस निकालकर निर्धारित स्थान पर पहुँचने का प्रयास कर रही थीं। पुलिस की लाठियों और गिरफ्तारी के भय के बावजूद वे पीछे नहीं हटीं। अनेक महिलाओं ने मोनुमेंट की सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा फहराया और स्वतंत्रता की घोषणा पढ़ी।


2. जुलूस के लालबाजार आने पर लोगों का क्या दशा हुई?

उत्तर:
जुलूस के लालबाजार पहुँचने पर पुलिस ने आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। अनेक लोगों को लाठियाँ मारी गईं और बहुत से लोग घायल हुए। महिलाओं के जुलूस को भी पुलिस ने रोका तथा उन्हें गिरफ्तार कर लालबाजार भेज दिया। कुल मिलाकर 105 स्त्रियाँ गिरफ्तार की गईं, जिन्हें बाद में रात नौ बजे छोड़ दिया गया।


3. “जब से कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान में नहीं की गई और यह सभा तो कहना चाहिए कि एक प्रकार की खुली लड़ाई थी।क्या कानून भंग करना उचित था? पाठ के संदर्भ में अपने विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर:
पाठ के संदर्भ में कानून भंग करना स्वतंत्रता आंदोलन का एक अहिंसक विरोध-मार्ग था। अंग्रेज़ी सरकार ने सभा और झंडा फहराने पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन देशवासियों ने स्वतंत्रता के अधिकार के लिए उसका विरोध किया। इसलिए अन्यायपूर्ण शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से कानून भंग करना उस समय उचित और आवश्यक प्रतीत होता है।


4. बहुत से लोग घायल हुए, बहुतों को लॉकअप में रखा गया, बहुत-सी स्त्रियाँ जेल गईं, फिर भी इस दिन को अपूर्व बताया गया है। आपके विचार में यह सब क्यों हुआ होगा? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर:
यह दिन इसलिए अपूर्व था क्योंकि पुलिस के दमन के बावजूद लोगों का उत्साह और देशभक्ति कम नहीं हुई। हजारों लोग स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए एकत्र हुए, महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और अनेक लोगों ने गिरफ्तारी तथा लाठीचार्ज का सामना किया। इस घटना से कलकत्ता में स्वतंत्रता आंदोलन की शक्ति और सक्रियता सिद्ध हुई।


🟠 लिखित — (ग)

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।

1. “आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया।

उत्तर:
लेखक का आशय है कि पहले लोगों को लगता था कि बंगाल और विशेषकर कलकत्ता में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए पर्याप्त सक्रियता नहीं है। लेकिन 26 जनवरी 1931 को हजारों लोगों ने आंदोलन में भाग लिया, महिलाओं ने जुलूस निकाले और अनेक लोगों ने गिरफ्तारी व लाठीचार्ज का सामना किया। इससे कलकत्ता की निष्क्रियता का आरोप काफी हद तक समाप्त हो गया।


2. “खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।

उत्तर:
इसका आशय है कि अंग्रेज़ी सरकार ने सभा पर रोक लगा दी थी और लोगों को गिरफ्तार करने की चेतावनी दी थी। इसके बावजूद देशवासियों ने खुले रूप से सभा करने, राष्ट्रीय झंडा फहराने और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा लेने का निर्णय किया। इसलिए यह सभा अंग्रेज़ी शासन के लिए एक साहसपूर्ण और खुली चुनौती थी।


🔵 भाषा-अध्ययन

1. रचना की दृष्टि से वाक्य तीन प्रकार के होते हैं

(क) सरल वाक्य

जिस वाक्य में एक ही मुख्य क्रिया होती है, उसे सरल वाक्य कहते हैं।

उदाहरण:
लोग टोलियाँ बनाकर मैदान में घूमने लगे।


(ख) संयुक्त वाक्य

जिस वाक्य में दो या दो से अधिक स्वतंत्र उपवाक्य और, तथा, लेकिन, परंतु आदि से जुड़े हों, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं।

उदाहरण:
पुलिस लाठियाँ चला रही थी और लोग मैदान में डटे हुए थे।


(ग) मिश्र वाक्य

जिस वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य और एक या अधिक आश्रित उपवाक्य हों, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं।

उदाहरण:
जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया, तब बहुत लोग घायल हुए।


निम्नलिखित वाक्यों को सरल वाक्य में बदलिए

(क)

जो दो आदमी पकड़े गए, वे बहुत घबरा गए।

सरल वाक्य:
पकड़े गए दोनों आदमी बहुत घबरा गए।

(ख)

मैदान में हजारों आदमियों की भीड़ होने लगी और लोग टोलियाँ बना-बनाकर मैदान में घूमने लगे।

सरल वाक्य:
मैदान में हजारों आदमियों की भीड़ टोलियाँ बनाकर घूमने लगी।

(ग)

सुभाष बाबू को पकड़ लिया गया और गाड़ी में बैठाकर लालबाजार लॉकअप में भेज दिया गया।

सरल वाक्य:
सुभाष बाबू को पकड़कर गाड़ी से लालबाजार लॉकअप भेज दिया गया।


II. ‘बड़े भाई साहबपाठ में भी इसी तरह के सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य ढूँढ़कर लिखिए।

सरल वाक्य

मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

संयुक्त वाक्य

मैं खेलना चाहता था, लेकिन बड़े भाई साहब मुझे पढ़ने के लिए कहते थे।

मिश्र वाक्य

जब मैं खेलकर लौटता था, तब बड़े भाई साहब मुझे डाँटते थे।


🟢 2. निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं को ध्यान से पढ़िए और समझिए कि जाना, रहा और चुका क्रियाओं का प्रयोग किस प्रकार किया गया है।

(क)

1. कई मकान सजा दिए गए थे।

उत्तर: यहाँ दिए सहायक क्रिया के रूप में प्रयुक्त हुआ है और कार्य के पूर्ण हो जाने का भाव प्रकट करता है।

2. कलकत्ता के प्रत्येक भाग में झंडे लगाए गए थे।

उत्तर: यहाँ गए सहायक क्रिया है। इससे झंडे लगाए जाने की क्रिया के पूर्ण हो जाने का भाव प्रकट होता है।


(ख)

1. बड़े बाज़ार के प्रायः मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा था।

उत्तर: यहाँ रहा क्रिया की निरंतरता को प्रकट करता है।

2. कितनी ही लारियाँ शहर में घूमाई जा रही थीं।

उत्तर: यहाँ जा रही से कार्य के लगातार जारी रहने का भाव प्रकट होता है।

3. पुलिस भी अपनी पूरी ताकत से शहर में गश्त देकर प्रदर्शन कर रही थी।

उत्तर: यहाँ रही क्रिया के निरंतर होने का भाव व्यक्त करता है।


(ग)

1. सुभाष बाबू के जुलूस का भार पूर्णोदास पर था, वह प्रबंध कर चुका था।

उत्तर: यहाँ कर चुका था से कार्य के पहले ही पूरा हो जाने का भाव प्रकट होता है।

2. पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकल चुका था।

उत्तर: यहाँ निकल चुका था से नोटिस जारी होने की क्रिया के पूर्ण हो जाने का भाव व्यक्त होता है।


🟣 3. दिए गए शब्दों की संधि पर ध्यान दीजिए

उदाहरण:

विद्या + अर्थी = विद्यार्थी

यहाँ विद्याशब्द के अंतिम स्वर और अर्थीशब्द के प्रथम स्वर के मिलने से हो जाता है।

इसी प्रकार अर्थीशब्द के प्रथम स्वर और विद्याशब्द के अंतिम स्वर के मिलने पर शब्द बनता है।


दिए गए शब्दों की संधि कीजिए:

1. श्रद्धा + आनंद

= श्रद्धानंद

2. प्रति + एक

= प्रत्येक

3. पुरुष + उत्तम

= पुरुषोत्तम

4. बड़ा + उत्सव

= बड़ोत्सव

5. पुनः + आवृत्ति

= पुनरावृत्ति

6. ज्योति + मय

= ज्योतिर्मय


🟠 योग्यता-विस्तार

योग्यता-विस्तार के अंतर्गत 26 जनवरी के इतिहास, डायरी-लेखन, जमनालाल बजाज तथा स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका से संबंधित गतिविधियाँ दी गई हैं।

1. 26 जनवरी का इतिहास

प्रश्न:

ब्रिटिश रूप से देखे हुए भारत में अंग्रेजों के समय में ही हमारा यह अधिकार हो चुका था कि 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता था?

उत्तर:
26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की घोषणा की थी और इस दिन को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद कई वर्षों तक 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता रहा। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और इसी कारण यह तारीख भारतीय इतिहास में विशेष महत्व रखती है।


✍️ 2. डायरी-लेखन

प्रश्न:

डायरी एक निजी विधा है। इसमें दैनिक जीवन में होने वाली घटनाओं को लिखा जाता है। आप भी अपनी दैनिक जिंदगी से संबंधित घटनाओं को डायरी में लिखने का अभ्यास करें।

नमूना डायरी

दिनांक — 13 सितंबर 2026
समय रात 9:00 बजे

आज का दिन मेरे लिए बहुत अच्छा रहा। सुबह समय पर उठकर मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। विद्यालय में अध्यापक ने हमें देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बताया। डायरी का एक पन्नापढ़ते हुए मुझे स्वतंत्रता सेनानियों के साहस और देशभक्ति के बारे में जानने का अवसर मिला।

आज मैंने यह समझा कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।

मेरी डायरी


🟢 3. जमनालाल बजाज

प्रश्न:

जमनालाल बजाज महात्मा गांधी के पाँचवें पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। क्या यह सही है?

उत्तर:
जमनालाल बजाज महात्मा गांधी के जैविक पुत्र नहीं थे, बल्कि गांधीजी उन्हें अपने पुत्र के समान मानते थे। वे गांधीजी के निकट सहयोगी और स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उन्होंने देश की स्वतंत्रता तथा सामाजिक सुधार के कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


🟢 4. स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

 

महिलाओं के योगदान का संक्षिप्त परिचय

श्रीमती अनुबाई लिमयेमहाराष्ट्र में सामाजिक और राष्ट्रीय गतिविधियों से जुड़ी रहीं।

सरस्वती रावआंध्र प्रदेश में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं में उनका योगदान रहा।

मीरा अय्यरस्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित गतिविधियों में भाग लेने वाली महिलाओं में उनका नाम उल्लेखनीय है।

मिस्टर मैत्रेयीस्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय महिलाओं के संदर्भ में उनका उल्लेख मिलता है।

कुंतला कुमारी आप्टेस्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक चेतना से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं में उनका योगदान रहा।


🟣 परियोजना कार्य

PDF के अंतिम पृष्ठ पर चार परियोजना कार्य दिए गए हैं।

परियोजना–1

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं का योगदान

दिए गए नामों में से किसी एक महिला के बारे में जानकारी एकत्र कीजिए।

नमूना सरोजिनी नायडू

सरोजिनी नायडू भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख महिला नेताओं में थीं। वे एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थीं। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने और देश की स्वतंत्रता के लिए लोगों को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष भी बनीं।


🟣 परियोजना–2

स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित संग्रहालय/स्थान

कार्य:

अपने आसपास स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े किसी संग्रहालय, स्मारक या ऐतिहासिक स्थान की जानकारी प्राप्त कीजिए।

नमूना उत्तर

मैंने अपने क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐतिहासिक स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त की। वहाँ स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित स्मृतियाँ, चित्र और ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी उपलब्ध है। ऐसे स्थानों पर जाने से विद्यार्थियों को केवल किताबों से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से इतिहास को समझने का अवसर मिलता है।


🟣 परियोजना–3

केवल प्रचार में ही दो हजार रुपये खर्च किए गए थे

प्रश्न:

इस कथन के महत्व को ध्यान में रखते हुए अनुमान लगाइए कि प्रचार-प्रसार के लिए किन माध्यमों का उपयोग किया गया होगा?

उत्तर:
1931 के समय प्रचार के लिए आज के जैसे इंटरनेट और सोशल मीडिया उपलब्ध नहीं थे। इसलिए पर्चे बाँटना, पोस्टर लगाना, लोगों के घर जाकर सूचना देना, सभाएँ करना, जुलूस निकालना तथा मौखिक रूप से लोगों को कार्यक्रम की जानकारी देना प्रमुख माध्यम रहे होंगे। पाठ में कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर समझाने का भी उल्लेख मिलता है।


🟣 परियोजना–4

पुलिस लाठीचार्ज की सूचना पर मोहल्ले को दो-दो रुपये

प्रश्न:

यदि आपको अपने विद्यालय में लगने वाले पुलिस कैंप की सूचना मिले तो आप इस बात का प्रचार बिना पैसे के कैसे करेंगे?

उत्तर:

यदि मेरे विद्यालय में पुलिस कैंप लगने की सूचना हो और मुझे इसकी जानकारी बिना पैसे खर्च किए लोगों तक पहुँचानी हो, तो मैं विद्यालय की घोषणा-प्रणाली, कक्षा में सूचना, नोटिस बोर्ड, विद्यार्थियों के समूह, स्थानीय WhatsApp समूह तथा मौखिक सूचना का उपयोग करूँगा।

मैं अपने सहपाठियों से भी कहूँगा कि वे अपने-अपने परिवार और आसपास के लोगों को इसकी जानकारी दें। इस प्रकार बिना पैसे खर्च किए कम समय में बहुत से लोगों तक सूचना पहुँचाई जा सकती है।


परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न

इस अध्याय की परीक्षा-तैयारी के लिए इन प्रश्नों को विशेष रूप से तैयार करें:

1.   26 जनवरी 1931 का दिन कलकत्ता वासियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?

2.   अंग्रेज़ी सरकार ने स्वतंत्रता दिवस के आयोजन को रोकने के लिए क्या-क्या किया?

3.   सुभाष बाबू के जुलूस का क्या परिणाम हुआ?

4.   स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

5.   पुलिस की दमनकारी कार्रवाई के बावजूद आंदोलनकारी पीछे क्यों नहीं हटे?

6.   आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है”—आशय स्पष्ट कीजिए।

7.   खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी”—आशय स्पष्ट कीजिए।

8.   26 जनवरी 1931 की घटना से कलकत्ता के संबंध में लोगों की धारणा में क्या परिवर्तन आया?

9.   डायरी का एक पन्नापाठ में देशभक्ति और जन-भागीदारी का चित्रण कीजिए।

10.               पाठ के आधार पर स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालिए।


 

 

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