सुमित्रानंदन पंत — पर्वत प्रदेश में पावस प्रश्न-अभ्यास
🌧️ पर्वत प्रदेश में पावस – प्रश्न-अभ्यास के सभी उत्तर
सुमित्रानंदन पंत | कक्षा 10 हिंदी
नीचे सभी प्रश्नों के उत्तर क्रम से दिए गए हैं। उत्तरों को कक्षा 10 के विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार सरल रखा गया है, ताकि वे समझने के साथ-साथ परीक्षा में भी लिख सकें।
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
1. पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पावस अर्थात वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश की प्रकृति का रूप पल-पल
बदलता रहता है। कभी पर्वत बादलों से ढक जाते हैं, कभी झरने
तेज गति से बहने लगते हैं और उनके झाग मोतियों की लड़ियों जैसे दिखाई देते हैं।
पेड़-पौधे धुले हुए और हरे-भरे दिखाई देते हैं। तालाब का शांत जल दर्पण की तरह
पर्वत का प्रतिबिंब दिखाता है।
कभी घने बादल इतने नीचे आ जाते हैं कि ऐसा लगता है जैसे पूरा आकाश धरती पर उतर आया हो। इस प्रकार वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश का दृश्य लगातार बदलता रहता है।
उदाहरण:
जैसे बारिश के समय कुछ देर पहले दिखाई देने वाला पहाड़ अचानक बादलों
और कोहरे में छिप जाता है और थोड़ी देर बाद फिर दिखाई देने लगता है।
2. ‘मेखलाकार’ शब्द का क्या अर्थ है? कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है?
उत्तर:
मेखलाकार का अर्थ है—मेखला के आकार का, अर्थात कमर में पहने जाने
वाले कमरबंद या करधनी के समान आकार वाला।
कवि ने इस शब्द का प्रयोग पर्वतों की विशाल श्रृंखला के लिए किया है। दूर-दूर तक फैले हुए पर्वत ऐसे दिखाई देते हैं जैसे किसी ने धरती की कमर के चारों ओर मेखला पहन रखी हो।
इससे पर्वतों की विशालता और उनकी घुमावदार आकृति का सुंदर चित्र सामने आता है।
3. ‘सहस्र दृग-सुमन’ से क्या तात्पर्य है? कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा?
उत्तर:
‘सहस्र दृग-सुमन’ का अर्थ है—हजारों आँखों के समान फूल।
कवि ने इसका प्रयोग पर्वतों पर खिले हुए असंख्य फूलों के लिए किया है। पर्वत पर अनेक फूल खिले हुए हैं, जिन्हें कवि ने पर्वत की हजारों आँखों के समान माना है।
कवि की कल्पना है कि पर्वत इन फूलों रूपी आँखों को खोलकर नीचे तालाब में अपने विशाल रूप को बार-बार देख रहा है।
उदाहरण:
जैसे कोई व्यक्ति आईने में अपनी आँखों से अपना चेहरा देखता है,
वैसे ही कवि की कल्पना में पर्वत फूलों रूपी आँखों से तालाब में
अपना प्रतिबिंब देख रहा है।
4. कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों?
उत्तर:
कवि ने तालाब की समानता दर्पण (आईने) के साथ दिखाई है।
तालाब का जल शांत और स्वच्छ है। उसमें पर्वत का विशाल प्रतिबिंब साफ दिखाई देता है। इसलिए कवि को वह तालाब एक विशाल दर्पण के समान लगता है।
कविता में कहा गया है—
“जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!”
इससे तालाब के शांत, स्वच्छ और विस्तृत रूप का सुंदर चित्र सामने आता है।
5. पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं?
उत्तर:
पर्वतों पर उगे ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर उठे हुए दिखाई देते हैं।
कवि को ऐसा लगता है कि वे ऊँची आकांक्षाओं के कारण आकाश की ओर देख रहे हैं।
वे बिना पलक झपकाए और स्थिर होकर शांत आकाश की ओर देख रहे हैं। कवि ने पेड़ों को मनुष्य के समान भावनाओं से युक्त दिखाया है।
वे मनुष्य की ऊँचे लक्ष्य प्राप्त करने की इच्छा और आकांक्षा को प्रतिबिंबित करते हैं।
उदाहरण:
जिस प्रकार कोई विद्यार्थी अपने बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए
लगातार आगे बढ़ना चाहता है, उसी प्रकार वृक्ष भी आकाश की
ऊँचाई को पाने के लिए ऊपर उठते हुए दिखाई देते हैं।
6. शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में क्यों धँस गए?
उत्तर:
वर्षा ऋतु में घने और काले बादल पर्वतों पर छा गए थे। बादल इतने
नीचे आ गए कि उन्होंने पर्वतों और पेड़ों के ऊपरी हिस्सों को ढक लिया। इस कारण शाल
के वृक्षों के केवल कुछ निचले हिस्से दिखाई दे रहे थे।
कवि को ऐसा लगा कि शाल के वृक्ष डरकर धरती में धँस गए हैं।
यह कवि की कल्पनाशीलता और मानवीकरण अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
7. झरने किसके गौरव का गान कर रहे हैं? बहते हुए झरने की तुलना किससे की गई है?
उत्तर:
झरने पर्वत के गौरव और महिमा का गान कर रहे हैं। झरने के
लगातार बहने की ‘झर-झर’ ध्वनि
कवि को गीत जैसी सुनाई देती है।
बहते हुए झरनों की तुलना मोतियों की लड़ियों से की गई है।
कवि कहते हैं—
“मोती की लड़ियों-से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!”
वर्षा के कारण झरनों में सफेद झाग बन रहा है, इसलिए वे मोतियों की सुंदर मालाओं जैसे दिखाई देते हैं।
(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए
1. “है टूट पड़ा भू पर अंबर!”
भावार्थ:
इन पंक्तियों में कवि ने वर्षा ऋतु के समय आकाश और धरती के बीच के दृश्य का वर्णन किया है। घने बादल इतने नीचे आ गए हैं कि ऐसा लगता है जैसे पूरा आकाश ही धरती पर टूटकर गिर पड़ा हो।
बादलों के कारण पर्वत और आसपास का क्षेत्र ढक जाता है। चारों ओर धुंध, बादल और वर्षा दिखाई देती है।
उदाहरण:
जैसे पहाड़ों पर घना कोहरा या बादल इतनी नीचे उतर आए कि सामने की वस्तुएँ भी दिखाई न दें, उसी प्रकार कवि को लगता है कि आकाश धरती पर आ गया है।
मुख्य भाव:
घने बादलों द्वारा पर्वतीय प्रदेश के पूरी तरह ढक जाने का अद्भुत चित्रण।
2.
“यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल!”
कठिन शब्द
- जलद – बादल
- यान – वाहन
- विचरना – घूमना
- इंद्र – वर्षा के देवता
- इंद्रजाल – जादुई खेल
भावार्थ:
वर्षा ऋतु में प्रकृति का रूप पल-पल बदल रहा है। कभी पर्वत दिखाई देता है, कभी बादलों में छिप जाता है, झरने तेज बहने लगते हैं और चारों ओर धुंध फैल जाती है।
प्रकृति के इन अद्भुत और लगातार बदलते दृश्यों को देखकर कवि को ऐसा लगता है जैसे इंद्र बादलों के वाहन पर घूम-घूमकर कोई जादुई खेल दिखा रहे हों।
उदाहरण:
जैसे किसी जादू के खेल में थोड़ी देर में दृश्य बदल जाता है, वैसे ही वर्षा ऋतु में पहाड़ों का दृश्य कुछ ही क्षणों में बदल जाता है।
मुख्य भाव:
वर्षा ऋतु में प्रकृति के अद्भुत और लगातार बदलते रूप का चित्रण।
3.
“गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ
चिंतापर।”
कठिन शब्द
- गिरिवर – श्रेष्ठ/बड़ा पर्वत
- उर – हृदय
- तरुवर – पेड़
- उच्चाकांक्षा – ऊँचा लक्ष्य पाने की इच्छा
- नभ – आकाश
- नीरव – शांत
- अनिमेष – बिना पलक झपकाए
- अटल – स्थिर
- चिंतापर – चिंतित
भावार्थ:
पर्वत के हृदय से निकलकर ऊँचे-ऊँचे पेड़ आकाश की ओर बढ़ रहे हैं। कवि को लगता है कि उनमें आकाश की ऊँचाई को प्राप्त करने की बहुत बड़ी इच्छा है।
वे पेड़ शांत आकाश की ओर बिना पलक झपकाए और स्थिर होकर देख रहे हैं। कवि ने पेड़ों को मनुष्य की तरह इच्छाओं और भावनाओं से युक्त दिखाया है।
उदाहरण:
जैसे कोई विद्यार्थी अपने बड़े सपने को पूरा करने के लिए लगातार ऊँचाई की ओर बढ़ना चाहता है, वैसे ही पेड़ आकाश की ओर उठते हुए दिखाई देते हैं।
मुख्य भाव:
प्रकृति के माध्यम से मनुष्य की ऊँची आकांक्षाओं और लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा को व्यक्त किया गया है।
🌺 कविता का सौंदर्य
1. इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किस प्रकार किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस कविता में कवि ने प्रकृति की निर्जीव वस्तुओं को मनुष्य के समान सोचने,
देखने, गाने और भावनाएँ रखने वाला बताया है। यही मानवीकरण अलंकार है।
इसके प्रमुख उदाहरण हैं—
🔹 पर्वत को देखने वाला बताया गया है
“अवलोक रहा है बार-बार”
ऐसा लगता है जैसे पर्वत अपनी आँखों से तालाब में अपना प्रतिबिंब देख रहा हो।
🔹 फूलों को आँखें बताया गया है
“अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़”
फूलों को पर्वत की हजारों आँखों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
🔹 झरनों को गाने वाला बताया गया है
“गिरि का गौरव गाकर झर-झर”
झरनों की आवाज को पर्वत की महिमा का गीत गाने जैसा बताया गया है।
🔹 पेड़ों को आकांक्षा रखने वाला बताया गया है
“उच्चाकांक्षाओं से तरुवर”
पेड़ों में मनुष्य जैसी ऊँची आकांक्षाएँ दिखाई गई हैं।
इस प्रकार पूरी कविता में प्रकृति को जीवंत और मानवीय रूप प्रदान किया गया है।
2. आपकी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य इनमें से किस पर निर्भर करता है?
(क) अनेक शब्दों की आवृत्ति
(ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा
(ग) कविता की संगीतात्मकता
उत्तर:
मेरी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य मुख्य रूप से (ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा पर निर्भर करता है।
कवि ने शब्दों के माध्यम से प्रकृति के ऐसे सुंदर चित्र खींचे हैं कि पाठक के सामने पूरा पर्वतीय दृश्य जीवंत हो उठता है।
उदाहरण के लिए—
“मोती की लड़ियों-से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!”
इन पंक्तियों को पढ़ते ही आँखों के सामने सफेद झाग से भरे झरने मोतियों की लड़ियों की तरह गिरते हुए दिखाई देने लगते हैं।
इसी प्रकार—
“दर्पण-सा फैला है विशाल!”
पढ़ते ही शांत और विस्तृत तालाब में पर्वत का प्रतिबिंब दिखाई देने लगता है।
हालाँकि कविता में संगीतात्मकता और शब्दों की आवृत्ति भी है, लेकिन इसका सबसे प्रमुख आकर्षण इसकी चित्रमयी भाषा है।
3. कवि ने चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित किया है। ऐसे स्थलों को छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
कवि ने पूरी कविता में चित्रात्मक शैली का सुंदर प्रयोग किया है।
ऐसे प्रमुख स्थल हैं—
1. पर्वत और तालाब का दृश्य
“नीचे जल में निज महाकार,
—जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण-सा फैला है विशाल!”
यहाँ तालाब को दर्पण के समान बताया गया है, जिसमें पर्वत का प्रतिबिंब दिखाई देता है।
2. झरनों का दृश्य
“मोती की लड़ियों-से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!”
यहाँ झरनों की तुलना मोतियों की लड़ियों से की गई है।
3. पेड़ों का दृश्य
“हैं झाँक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ
चिंतापर।”
यहाँ पेड़ों को शांत आकाश की ओर देखते हुए दिखाया गया है।
4. घने बादलों का दृश्य
“है टूट पड़ा भू पर अंबर!”
यहाँ बादलों के धरती पर उतर आने का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया गया है।
5. वर्षा का जादुई दृश्य
“यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल!”
यहाँ वर्षा ऋतु के पूरे दृश्य को इंद्र के जादुई खेल जैसा बताया गया है।
🌱 योग्यता-विस्तार
1. इस कविता में वर्षा ऋतु में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों की बात कही गई है। आप अपने यहाँ वर्षा ऋतु में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
वर्षा ऋतु आने पर हमारे आसपास की प्रकृति में अनेक परिवर्तन दिखाई देते हैं। सूखे और मुरझाए हुए पेड़-पौधे फिर से हरे-भरे हो जाते हैं। खेतों में नई हरियाली दिखाई देने लगती है। तालाब, नदियाँ और पोखर पानी से भर जाते हैं।
बारिश के बाद वातावरण ठंडा और सुहावना हो जाता है। पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर साफ और चमकदार दिखाई देती हैं। कई प्रकार के छोटे-बड़े जीव-जंतु और पक्षी भी अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।
गाँवों में वर्षा का विशेष महत्व है क्योंकि खेती काफी हद तक वर्षा के पानी पर निर्भर रहती है। वर्षा होने से धान, मक्का, बाजरा आदि फसलों की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं।
संक्षेप में:
बारिश → हरियाली → जलस्रोतों में पानी → ठंडा वातावरण → खेती के लिए लाभ → प्रकृति में नई जान
📝 परियोजना कार्य
1. वर्षा ऋतु पर लिखी गई अन्य कवियों की कविताओं का संग्रह
इस परियोजना के लिए विद्यार्थी वर्षा ऋतु पर लिखी गई कविताओं का संग्रह तैयार कर सकते हैं।
परियोजना को इस प्रकार तैयार करें:
शीर्षक: वर्षा ऋतु पर कविताओं का संग्रह
|
क्रम |
कवि |
कविता/रचना |
मुख्य भाव |
|
1 |
सुमित्रानंदन पंत |
पर्वत प्रदेश में पावस |
पर्वतीय प्रदेश में वर्षा का सौंदर्य |
|
2 |
रामधारी सिंह दिनकर |
वर्षा संबंधी काव्यांश |
प्रकृति और वर्षा |
|
3 |
निराला |
बादल राग |
बादल और प्रकृति |
|
4 |
अन्य कवि |
अपनी पसंद की कविता |
वर्षा का अलग रूप |
विद्यार्थी प्रत्येक कविता की 4–5 पंक्तियाँ, कवि का नाम और उसका मुख्य भाव लिखकर कक्षा में सुना सकते हैं।
✍️ 2. दिए गए प्रकृति-विषयक शब्दों का प्रयोग करते हुए कविता लिखिए
दिए गए शब्द हैं—बारिश, झरने, इंद्रधनुष, बादल, कोयल, पानी, पक्षी, सूरज, हरियाली, फूल, फल आदि।
उदाहरण कविता
🌧️ बारिश आई
काले-काले बादल आए,
ठंडी बूँदें संग में लाए।
झरने झर-झर गीत सुनाएँ,
पक्षी अपने पंख फैलाएँ।
हरियाली से धरती सजी,
फूलों से हर डाली सजी।
कोयल मीठी तान सुनाए,
इंद्रधनुष आकाश सजाए।
सूरज बादल में छिप जाए,
पानी खेतों में लहराए।
फलों से बाग महक उठे,
बारिश से सब प्राण खिले।
🎯 एक नजर में पूरे प्रश्न-अभ्यास की तैयारी
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
- पावस = वर्षा ऋतु
- मेखलाकार = मेखला/कमरबंद के आकार का
- सहस्र दृग-सुमन = हजारों आँखों के समान फूल
- तालाब = दर्पण के समान
- झरने = मोतियों की लड़ियों के समान
- तरुवर = ऊँची आकांक्षाओं वाले मनुष्य जैसे
- शाल वृक्ष = भयभीत होकर धरती में धँसे हुए
- अंबर = आकाश
- जलद = बादल
- इंद्रजाल = जादुई खेल
- झरनों का गौरव = पर्वत की महिमा
- मुख्य अलंकार = मानवीकरण
- कविता की प्रमुख विशेषता = चित्रमयी भाषा
- मुख्य विषय = वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेश के बदलते प्राकृतिक दृश्य
⭐ कविता का मूल संदेश
सुमित्रानंदन पंत ने ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ में वर्षा ऋतु के दौरान पर्वतीय प्रकृति के क्षण-क्षण बदलते रूप को अपनी कल्पनाशील और चित्रमयी भाषा के माध्यम से जीवंत कर दिया है।
🎯 सुमित्रानंदन पंत - जीवन परिचय
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