रवींद्रनाथ ठाकुर — ‘आत्मत्राण’ का भावार्थ, विस्तृत व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ (Rabindranath Thakur — ‘Atmatran’, Bhawarth, Vyakhya, Kathin Shabdo ke Arth)
रवींद्रनाथ ठाकुर — ‘आत्मत्राण’
अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी
काव्यांश 1
विपदाओं से
मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल
इतना होवे (करुणामय)
कभी न
विपदा में पड़ूँ भय।
दुःख-ताप
से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर
इतना होवे (करुणामय)
दुःख
को मैं कर सकूँ सदा जय।
कठिन शब्दार्थ
|
शब्द |
अर्थ |
|
विपदाओं |
मुसीबतों, संकटों |
|
प्रार्थना |
विनती, निवेदन |
|
करुणामय |
दयालु, कृपालु |
|
विपदा |
संकट, कठिनाई |
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भय |
डर |
|
दुःख-ताप |
दुःख और कष्ट |
|
व्यथित |
दुखी, परेशान |
|
चित्त |
मन |
|
सांत्वना |
ढाढ़स, दिलासा |
|
जय |
जीत, विजय |
पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ
“विपदाओं से
मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं”
कवि ईश्वर से कहता है कि मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि आप मुझे जीवन की सभी मुसीबतों से बचा लें। मैं यह नहीं चाहता कि मेरा जीवन हमेशा कठिनाइयों से मुक्त रहे।
“केवल इतना
होवे (करुणामय)”
हे दयालु ईश्वर! मेरी केवल इतनी इच्छा है कि मुझे कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिले।
“कभी न विपदा
में पड़ूँ भय।”
कवि चाहता है कि संकट आने पर उसके मन में भय पैदा न हो। वह कठिनाइयों से घबराकर कमजोर न पड़े।
“दुःख-ताप से
व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही”
कवि कहता है कि यदि दुःख के समय आप मुझे सांत्वना या दिलासा न भी दें, तो कोई बात नहीं।
“पर इतना होवे
(करुणामय)”
लेकिन हे दयालु ईश्वर! मेरी एक इच्छा अवश्य पूरी करना।
“दुःख को मैं
कर सकूँ सदा जय।”
मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं अपने दुःख और कठिनाइयों पर हमेशा विजय प्राप्त कर सकूँ।
विस्तृत भावार्थ
इस काव्यांश में कवि ईश्वर से मुसीबतों से बचाने की नहीं, बल्कि मुसीबतों का सामना करने की शक्ति माँगता है। कवि का विचार बहुत प्रेरणादायक है। वह जीवन को कठिनाइयों से पूरी तरह मुक्त नहीं करना चाहता, क्योंकि कठिनाइयाँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं।
कवि चाहता है कि जब उसके जीवन में संकट आएँ तो वह डरकर भागे नहीं, बल्कि हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ उनका सामना करे। वह ईश्वर से यह भी नहीं कहता कि दुःख के समय उसे सांत्वना या सहारा मिले। उसकी इच्छा केवल इतनी है कि उसके भीतर इतनी शक्ति हो कि वह स्वयं अपने दुःखों पर विजय प्राप्त कर सके।
अर्थात् कवि समस्या को समाप्त करने की बजाय समस्या से लड़ने की शक्ति चाहता है।
उदाहरण
मान लीजिए किसी विद्यार्थी की परीक्षा बहुत कठिन हो और उसे डर लगने लगे। वह यह प्रार्थना करे कि—
“हे भगवान! प्रश्न-पत्र आसान कर देना।”
यह कवि की भावना नहीं है।
इसके बजाय वह कहे—
“हे भगवान! प्रश्न-पत्र कितना भी कठिन हो, मुझे घबराने मत देना और पूरी मेहनत व आत्मविश्वास से उसे हल करने की शक्ति देना।”
यही इस काव्यांश की भावना है।
काव्यांश 2
कोई कहीं
सहायक न मिले
तो
अपना बल पौरुष न हिले;
हानि
उठानी पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही
तो भी
मन में ना मानूँ क्षय।
कठिन शब्दार्थ
|
शब्द |
अर्थ |
|
सहायक |
मदद करने वाला |
|
अपना बल |
अपनी शक्ति |
|
पौरुष |
साहस, पुरुषार्थ, वीरता |
|
हानि |
नुकसान |
|
जगत |
संसार |
|
लाभ |
फायदा |
|
वंचना |
किसी चीज से वंचित होना, लाभ न मिलना |
|
क्षय |
कमी, कमजोरी, नष्ट होना |
पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ
“कोई कहीं
सहायक न मिले”
यदि कठिन समय में मेरी सहायता करने वाला कोई व्यक्ति मेरे साथ न हो...
“तो अपना बल
पौरुष न हिले;”
...तब भी मेरे अंदर का साहस, आत्मविश्वास और पुरुषार्थ कमजोर न पड़े।
“हानि उठानी
पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही”
यदि जीवन में मुझे नुकसान उठाना पड़े या मेरे हिस्से में सफलता और लाभ न आए...
“तो भी मन में
ना मानूँ क्षय।”
...फिर भी मैं अपने मन में खुद को कमजोर या पराजित नहीं मानूँ।
विस्तृत भावार्थ
इस काव्यांश में कवि आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की भावना व्यक्त करता है। वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि यदि कठिन समय में उसे किसी का सहारा न मिले, तब भी उसका साहस और आत्मबल कमजोर न हो।
जीवन में हर व्यक्ति को हमेशा दूसरों की सहायता नहीं मिल सकती। कई बार मनुष्य को अपनी समस्याओं का सामना अकेले ही करना पड़ता है। ऐसे समय में यदि व्यक्ति अपना आत्मविश्वास खो देता है तो छोटी-सी समस्या भी बहुत बड़ी लगने लगती है।
कवि चाहता है कि संसार में उसे नुकसान ही क्यों न उठाना पड़े, सफलता न मिले या परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध क्यों न हों, फिर भी वह अपने आपको कमजोर न समझे। उसके लिए वास्तविक हार बाहरी नुकसान नहीं, बल्कि मन से हार जाना है।
उदाहरण
एक विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। उसे परिवार या दोस्तों से पर्याप्त सहायता नहीं मिलती और पहली बार में वह परीक्षा में सफल भी नहीं होता।
यदि वह निराश होकर पढ़ाई छोड़ देता है, तो यह आत्मबल की कमी है।
लेकिन यदि वह कहता है—
“इस बार असफल हुआ हूँ, लेकिन अगली बार और मेहनत करूँगा।”
तो वह कवि की भावना के अनुसार अपना पौरुष और आत्मबल बनाए रखता है।
काव्यांश 3
मेरा त्राण
करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस
इतना होवे (करुणामय)
तरने
की हो शक्ति अनामय।
मेरा
भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल
इतना रखना अनुनय—
वहन
कर सकूँ इसको निर्भय।
कठिन शब्दार्थ
|
शब्द |
अर्थ |
|
त्राण |
रक्षा, बचाव, मुक्ति |
|
अनुदिन |
प्रतिदिन, हर दिन |
|
करुणामय |
दयालु |
|
तरने |
पार करने |
|
अनामय |
बिना बीमारी/कष्ट के, स्वस्थ रूप से |
|
भार |
बोझ, जिम्मेदारी |
|
लघु |
हल्का, कम |
|
सांत्वना |
दिलासा |
|
अनुनय |
विनम्र निवेदन |
|
वहन |
उठाना, सहना |
|
निर्भय |
बिना डर के |
पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ
“मेरा त्राण
करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं”
कवि कहता है कि मैं ईश्वर से यह प्रार्थना नहीं करता कि वे हर दिन मुझे कठिनाइयों से बचाते रहें।
“बस इतना होवे
(करुणामय)”
हे दयालु ईश्वर! मेरी केवल इतनी इच्छा है कि...
“तरने की हो
शक्ति अनामय।”
...मुझे कठिनाइयों और संकटों को पार करने की शक्ति प्राप्त हो।
“मेरा भार अगर
लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।”
यदि आप मेरी समस्याओं और जिम्मेदारियों को कम करके मुझे दिलासा नहीं देते, तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं है।
“केवल इतना
रखना अनुनय—”
मेरी केवल इतनी विनती स्वीकार कर लेना कि...
“वहन कर सकूँ
इसको निर्भय।”
...मैं अपने जीवन के सभी भार और जिम्मेदारियों को बिना डरे उठा सकूँ।
विस्तृत भावार्थ
इस काव्यांश में कवि अपनी प्रार्थना को और स्पष्ट करता है। वह ईश्वर से अपने जीवन के दुखों और जिम्मेदारियों को कम करने की माँग नहीं करता। वह चाहता है कि उसके अंदर उन सभी समस्याओं और जिम्मेदारियों को सहने तथा पार करने की शक्ति हो।
कवि के अनुसार मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार के बोझ आते हैं—परिवार की जिम्मेदारियाँ, पढ़ाई, काम, असफलता, आर्थिक कठिनाइयाँ और अन्य समस्याएँ। इन सबको समाप्त कर देना जीवन का उद्देश्य नहीं है। वास्तविक शक्ति यह है कि मनुष्य इन कठिनाइयों के बीच भी हिम्मत न खोए।
इसलिए कवि ईश्वर से परिस्थितियाँ बदलने की बजाय स्वयं को परिस्थितियों से लड़ने योग्य बनाने की प्रार्थना करता है।
उदाहरण
किसी परिवार में आर्थिक समस्या आ जाए। व्यक्ति यह प्रार्थना कर सकता है—
“भगवान, मेरी समस्या समाप्त कर दो।”
लेकिन कवि की भावना इससे अलग है—
“भगवान, समस्या चाहे कितनी भी बड़ी हो, मुझे मेहनत करने, सही निर्णय लेने और बिना डरे उसका सामना करने की शक्ति दो।”
काव्यांश 4
नत शिर
होकर सुख के दिन में
तव
मुख पहचान छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि
में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस
दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम
पर करूँ नहीं कुछ संशय।
कठिन शब्दार्थ
|
शब्द |
अर्थ |
|
नत शिर |
झुका हुआ सिर |
|
तव |
तुम्हारा/आपका |
|
छिन-छिन |
हर क्षण, पल-पल |
|
दुःख-रात्रि |
दुःख से भरा समय |
|
वंचना |
दूर हो जाना, साथ न मिलना |
|
निखिल |
संपूर्ण, पूरा |
|
मही |
पृथ्वी/संसार |
|
संशय |
संदेह, शक |
पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ
“नत शिर होकर
सुख के दिन में”
जब मेरे जीवन में सुख और सफलता के दिन हों, तब मैं विनम्र होकर रहूँ।
“तव मुख पहचान
छिन-छिन में।”
सुख के प्रत्येक क्षण में मुझे ईश्वर का स्मरण रहे और मैं यह न भूलूँ कि मेरी सफलता में ईश्वर की कृपा भी है।
“दुःख-रात्रि
में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही”
जब पूरा संसार या परिस्थितियाँ कठिन दुःख के समय में मेरा साथ छोड़ दें...
“उस दिन ऐसा
हो करुणामय,”
हे दयालु ईश्वर! उस समय भी...
“तुम पर करूँ
नहीं कुछ संशय।”
...मेरा विश्वास आप पर से न उठे। मेरे मन में आपके प्रति कोई संदेह पैदा न हो।
विस्तृत भावार्थ
कवि इस अंतिम काव्यांश में मनुष्य के सुख और दुःख दोनों समयों में ईश्वर के प्रति विश्वास की बात करता है।
कवि चाहता है कि जब उसके जीवन में सुख, सफलता और समृद्धि आए तो वह अहंकारी न बने। वह विनम्र बना रहे और हर क्षण ईश्वर को याद करता रहे।
इसके साथ ही कवि यह भी चाहता है कि जब उसके जीवन में अत्यंत कठिन दुःख आए और ऐसा लगे कि पूरा संसार उसका साथ छोड़ चुका है, तब भी उसका ईश्वर पर विश्वास कमजोर न पड़े।
अर्थात् सुख में विनम्रता और दुःख में विश्वास—यही इस काव्यांश का मुख्य संदेश है।
कवि ईश्वर से यह नहीं कहता कि उसके जीवन में कभी दुःख न आए। वह केवल यह चाहता है कि दुःख कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका विश्वास और आत्मबल न टूटे।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति बहुत सफल हो जाए और वह अपनी सफलता पर घमंड करने लगे, तो वह कवि की भावना के विपरीत है।
इसके विपरीत यदि वह सफलता मिलने पर भी विनम्र रहे और कहे—
“मैंने मेहनत की है, लेकिन मुझे मिले अवसर और सहायता के लिए मैं आभारी हूँ।”
तो यह सुख के समय विनम्र रहने का उदाहरण है।
इसी तरह यदि किसी कठिन परिस्थिति में सब लोग साथ छोड़ दें, फिर भी व्यक्ति उम्मीद और विश्वास बनाए रखे, तो यह दुःख में भी विश्वास न खोने की भावना है।
🌷 पूरी कविता का केंद्रीय भाव
‘आत्मत्राण’ कविता में रवींद्रनाथ ठाकुर मनुष्य की ओर से ईश्वर के सामने ऐसी प्रार्थना रखते हैं जिसमें वह सुख-सुविधा या संकटों से मुक्ति नहीं, बल्कि संकटों का सामना करने की शक्ति माँगता है।
कवि चाहता है कि—
· विपत्ति आने पर वह डरे नहीं।
· दुःखों के सामने उसका आत्मबल न टूटे।
· सहायता न मिलने पर भी वह अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखे।
· नुकसान होने पर भी वह स्वयं को कमजोर न माने।
· जीवन के बोझ और जिम्मेदारियों को निर्भय होकर उठा सके।
· सुख मिलने पर अहंकार न करे।
· दुःख आने पर ईश्वर पर से विश्वास न खोए।
एक वाक्य में कविता का संदेश
मनुष्य को ईश्वर से समस्याओं से बचाने की नहीं, बल्कि समस्याओं का साहसपूर्वक सामना करने की शक्ति माँगनी चाहिए।
🎯 रवींद्रनाथ ठाकुर - जीवन परिचय
🎯 रवींद्रनाथ ठाकुर - आत्मत्राण, व्याख्या, कठिन शब्दार्थ
🎯 रवींद्रनाथ ठाकुर - आत्मत्राण, प्रश्न - उत्तर
🎯 रवींद्रनाथ ठाकुर - आत्मत्राण, पूरा पाठ
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