निदा फ़ाज़ली : अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले — भावार्थ, प्रसंग, विस्तृत व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ (Nida Fazli : Ab Kaha Dusre Ke Dukh Se Dukhi Hone Wale, Bhawarth, Prasang, Vyakhya, Kathin Shabdo ke Arth)

 

📖 निदा फ़ाज़ली  — अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले

(Nida Fazli - Ab Kaha Dusre ke Dukh Se Dukhi Hone Wale) Class 10 Hindi Sparsh


 

 

📖 अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले

गद्यांश–1 : सुलेमान और चींटियों की घटना

📜 मूल पाठ

बाइबिल के सोलोमन जिन्हें कुरआन में सुलेमान कहा गया है, ईसा से 1025 वर्ष पूर्व एक बादशाह थे। कहा गया है, वह केवल मानव जाति के ही राजा नहीं थे, सारे छोटे-बड़े पशु-पक्षी के भी हाकिम थे। वह इन सबकी भाषा भी जानते थे। एक दफ़ा सुलेमान अपने लश्कर के साथ एक रास्ते से गुज़र रहे थे। रास्ते में कुछ चींटियों ने घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी तो डर कर एक-दूसरे से कहा, ‘आप जल्दी से अपने-अपने बिलों में चलो, फ़ौज आ रही है।’ सुलेमान उनकी बातें सुनकर थोड़ी दूर पर रुक गए और चींटियों से बोले, ‘घबराओ नहीं, सुलेमान को ख़ुदा ने सबका रखवाला बनाया है। मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं हूँ, सबके लिए मुहब्बत हूँ।’ चींटियों ने उनके लिए ईश्वर से दुआ की और सुलेमान अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गए।


🔤 कठिन शब्दार्थ

कठिन शब्द

अर्थ

बादशाह

राजा

हाकिम

शासक

दफ़ा

बार

लश्कर

सेना

गुज़रना

होकर निकलना

टाप

घोड़े के पैर की आवाज़

बिल

रहने का छोटा गड्ढा/घर

फ़ौज

सेना

घबराना

डर जाना

ख़ुदा

ईश्वर

रखवाला

रक्षा करने वाला

मुसीबत

परेशानी, संकट

मुहब्बत

प्रेम

दुआ

प्रार्थना

मंज़िल

लक्ष्य, गंतव्य


📌 प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखित पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने बाइबिल के सोलोमन अर्थात् कुरआन में वर्णित सुलेमान से जुड़ी एक घटना का उल्लेख किया है। इस घटना के माध्यम से लेखक ने मनुष्य के साथ-साथ छोटे जीवों के प्रति भी संवेदना और प्रेम की भावना को सामने रखा है।


📝 सरल अर्थ

लेखक बताता है कि बाइबिल में जिनका नाम सोलोमन और कुरआन में सुलेमान बताया गया है, वे ईसा से 1025 वर्ष पहले एक बादशाह थे। कहा जाता है कि वे केवल मनुष्यों के राजा नहीं थे, बल्कि छोटे-बड़े सभी पशु-पक्षियों पर भी उनका अधिकार था और वे उनकी भाषा समझते थे।

एक बार सुलेमान अपनी सेना के साथ किसी रास्ते से जा रहे थे। उनके घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनकर कुछ चींटियाँ डर गईं। उन्होंने दूसरी चींटियों से कहा कि वे जल्दी-जल्दी अपने बिलों में चली जाएँ, क्योंकि सेना आ रही है।

सुलेमान ने चींटियों की बातें सुन लीं। उन्होंने अपनी सेना को आगे बढ़ने से पहले थोड़ी दूर पर रोक दिया और चींटियों को आश्वस्त किया कि उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने उन्हें सबकी रक्षा करने वाला बनाया है और वे किसी के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि सबके लिए प्रेम हैं।

सुलेमान की इस संवेदनशीलता से चींटियाँ प्रसन्न हुईं और उन्होंने उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की। इसके बाद सुलेमान अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ गए।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  1. सोलोमन को कुरआन में सुलेमान कहा गया है।
  2. सुलेमान एक बादशाह थे।
  3. पाठ के अनुसार वे केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के भी हाकिम थे।
  4. वे पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे।
  5. चींटियाँ घोड़ों की टाप सुनकर डर गई थीं।
  6. सुलेमान ने चींटियों की बात सुनकर उन्हें आश्वस्त किया।
  7. उन्होंने स्वयं को “सबके लिए मुहब्बत” बताया।
  8. चींटियों ने सुलेमान के लिए ईश्वर से दुआ की।
  9. इस प्रसंग में जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम, दया और संवेदनशीलता का भाव दिखाई देता है।

🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. सोलोमन को कुरआन में किस नाम से जाना जाता है?

उत्तर: सोलोमन को कुरआन में सुलेमान के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2. सुलेमान के बारे में क्या कहा गया है?

उत्तर: कहा गया है कि सुलेमान केवल मानव जाति के राजा नहीं थे, बल्कि छोटे-बड़े सभी पशु-पक्षियों के भी हाकिम थे और उनकी भाषा जानते थे।

प्रश्न 3. चींटियाँ क्यों डर गई थीं?

उत्तर: चींटियों ने घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि सुलेमान की सेना आ रही है, इसलिए वे डर गईं और एक-दूसरे से अपने-अपने बिलों में जाने के लिए कहने लगीं।

प्रश्न 4. सुलेमान ने चींटियों से क्या कहा?

उत्तर: सुलेमान ने चींटियों को घबराने से मना किया और कहा कि ख़ुदा ने उन्हें सबका रखवाला बनाया है। वे किसी के लिए मुसीबत नहीं, बल्कि सबके लिए मुहब्बत हैं।

प्रश्न 5. चींटियों ने सुलेमान के लिए क्या किया?

उत्तर: चींटियों ने सुलेमान के लिए ईश्वर से दुआ की।


🌱 गद्यांश का मूल संदेश

इस छोटे-से प्रसंग में लेखक यह दिखाता है कि सच्ची संवेदनशीलता केवल मनुष्यों के दुख को समझने तक सीमित नहीं होती। छोटे-से-छोटे जीव के जीवन और भय को समझना भी करुणा और मानवीयता का हिस्सा है।


 

📖 अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले

गद्यांश–2 : शेख अयाज़ और चिड़िया का प्रसंग

📜 मूल पाठ

ऐसी एक घटना का ज़िक्र सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज़ ने अपनी आत्मकथा में किया है। उन्होंने लिखा है—‘एक दिन उनके पिता कुएँ से नहाकर लौटे। माँ ने भोजन परोसा। उन्होंने जैसे ही रोटी का कौर तोड़ा। उनकी नज़र अपनी बाजू पर पड़ी। वहाँ एक काला च्योंटा रंग रहा था। वह भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए।’ माँ ने पूछा, ‘क्या बात है? भोजन अच्छा नहीं लगा?’ शेख अयाज़ के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’


🔤 कठिन शब्दार्थ

कठिन शब्द

अर्थ

ज़िक्र

उल्लेख

महाकवि

महान कवि

आत्मकथा

अपने जीवन की कहानी

कुआँ

जल प्राप्त करने का स्थान

परोसा

भोजन सामने रखना

कौर

मुँह में रखने योग्य भोजन की मात्रा

बाजू

हाथ का ऊपरी भाग

च्योंटा

चींटा

बेघर

जिसका घर न हो

घर वाला

यहाँ किसी जीव का अपने घर में रहने वाला

कुएँ पर

कुएँ के पास


📌 प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश निदा फ़ाज़ली के पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज़ की आत्मकथा में वर्णित एक घटना का उल्लेख किया है। इस घटना के माध्यम से छोटे-से-छोटे जीव के प्रति संवेदना और करुणा को व्यक्त किया गया है।


📝 सरल अर्थ

शेख अयाज़ ने अपनी आत्मकथा में अपने पिता से जुड़ी एक घटना का वर्णन किया है।

एक दिन उनके पिता कुएँ से नहाकर घर लौटे। उनकी माँ ने उन्हें भोजन परोसा। जब उन्होंने रोटी का एक कौर तोड़ा, तभी उनकी नज़र अपनी बाजू पर पड़ी। वहाँ एक काला चींटा चल रहा था।

चींटे को देखकर वे अचानक भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए। उनकी पत्नी ने पूछा कि क्या भोजन अच्छा नहीं लगा। उन्होंने बताया कि ऐसी बात नहीं है।

उन्होंने कहा कि उनसे एक गलती हो गई है—उन्होंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। अर्थात् चींटा उनके शरीर पर आ गया था और संभवतः वह उनके शरीर पर अपने घर से दूर पहुँच गया था। इसलिए वे उस चींटे को वापस उसके घर के पास छोड़ने के लिए कुएँ की ओर जाने लगे।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  1. इस घटना का उल्लेख शेख अयाज़ की आत्मकथा में मिलता है।
  2. शेख अयाज़ सिंधी भाषा के महाकवि थे।
  3. उनके पिता को अपनी बाजू पर एक काला चींटा दिखाई दिया।
  4. चींटे को देखकर उन्होंने भोजन छोड़ दिया।
  5. उन्हें लगा कि उन्होंने एक जीव को उसके घर से दूर कर दिया है।
  6. वे चींटे को उसके घर के पास छोड़ने के लिए वापस कुएँ की ओर गए।
  7. यह प्रसंग जीव-जंतुओं के प्रति करुणा और संवेदनशीलता को दर्शाता है।
  8. लेखक छोटे जीव के जीवन और उसके घर के महत्व को भी मनुष्य के समान महत्वपूर्ण मानने की भावना प्रस्तुत करता है।

🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. शेख अयाज़ कौन थे?

उत्तर: शेख अयाज़ सिंधी भाषा के महाकवि थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं का वर्णन किया है।

प्रश्न 2. शेख अयाज़ के पिता ने भोजन क्यों छोड़ दिया?

उत्तर: उनकी बाजू पर एक काला चींटा दिखाई दिया। उन्हें लगा कि उन्होंने उस चींटे को उसके घर से दूर करके बेघर कर दिया है। इसी भावना से उन्होंने भोजन छोड़ दिया।

प्रश्न 3. शेख अयाज़ के पिता चींटे को लेकर कहाँ गए?

उत्तर: वे चींटे को उसके घर के पास छोड़ने के लिए कुएँ की ओर वापस गए, जहाँ से वह उनके साथ आया था।

प्रश्न 4. इस घटना से शेख अयाज़ के पिता के चरित्र की कौन-सी विशेषता सामने आती है?

उत्तर: इस घटना से उनके दयालु, संवेदनशील और जीव-जंतुओं के प्रति करुणाभाव रखने वाले व्यक्तित्व का परिचय मिलता है।

प्रश्न 5. “मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है”—इस कथन का क्या आशय है?

उत्तर: शेख अयाज़ के पिता का आशय था कि चींटा अपने घर से दूर उनके शरीर पर आ गया था। उन्हें लगा कि उनकी वजह से वह अपने घर से अलग हो गया है, इसलिए उसे वापस उसके घर पहुँचाना उनका दायित्व है।


🌱 गद्यांश का मूल संदेश

यह घटना बताती है कि संवेदनशील व्यक्ति के लिए किसी छोटे जीव का घर और उसका जीवन भी महत्वपूर्ण होता है। शेख अयाज़ के पिता ने एक चींटे को भी बेघर होने के दुख के रूप में देखा और उसे उसके स्थान तक पहुँचाने की जिम्मेदारी महसूस की।


 

📖 अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले

गद्यांश–3 : नूह और घायल कुत्ते का प्रसंग

📜 मूल पाठ

बाइबिल और दूसरे पावन ग्रंथों में नूह नाम के एक पैगंबर का ज़िक्र मिलता है। उनका असली नाम लशकर था, लेकिन अरब ने उनको नूह के लकब से याद किया है। वह इसलिए कि आप सारी उम्र रोते रहे। इसका कारण एक ज़ख्मी कुत्ता था। नूह के सामने से एक बार एक घायल कुत्ता गुज़रा। नूह ने उसे दुतकारते हुए कहा, ‘दूर हो जा गंदे कुत्ते!’ इस्लाम में कुत्तों को गंदा समझा जाता है। कुत्ते ने उनकी दुतकार सुनकर जवाब दिया, ‘न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान हो। बनाने वाला सबका तो वही एक है।’

🔤 कठिन शब्दार्थ

शब्द

अर्थ

पावन

पवित्र

ग्रंथ

धार्मिक/महत्वपूर्ण पुस्तक

पैगंबर

ईश्वर का संदेश देने वाला धार्मिक पुरुष

ज़िक्र

उल्लेख

असली नाम

वास्तविक नाम

लकब

उपनाम/विशेष नाम

ज़ख्मी

घायल

दुतकारना

झिड़कना, बुरा-भला कहकर दूर करना

मर्ज़ी

इच्छा

पसंद

इच्छा/चयन

बनाने वाला

सृष्टि की रचना करने वाला


📌 प्रसंग

प्रस्तुत गद्यांश निदा फ़ाज़ली के पाठ ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने नूह नामक पैगंबर और एक घायल कुत्ते के प्रसंग के माध्यम से सभी जीवों के प्रति समानता और संवेदना का भाव प्रस्तुत किया है।


📝 सरल अर्थ

लेखक बताता है कि बाइबिल और अन्य पवित्र ग्रंथों में नूह नाम के एक पैगंबर का उल्लेख मिलता है। पाठ के अनुसार उनका वास्तविक नाम लशकर था, लेकिन उन्हें नूह के नाम से याद किया गया क्योंकि वे पूरी जिंदगी रोते रहे।

उनके रोने का कारण एक घायल कुत्ता बताया गया है। एक बार नूह के सामने से एक घायल कुत्ता गुजरा। नूह ने उसे देखकर उसे दुतकारते हुए कहा कि दूर हट जाओ, गंदे कुत्ते।

कुत्ते ने नूह की बात का उत्तर देते हुए एक बहुत गहरी बात कही—न तो मैंने अपनी इच्छा से कुत्ते का रूप चुना है और न आपने अपनी इच्छा से मनुष्य का रूप चुना है। दोनों को बनाने वाला एक ही है।

अर्थात् किसी जीव के रूप, जाति या स्थिति के आधार पर उसे नीचा समझना उचित नहीं है। सभी जीव एक ही सृष्टिकर्ता की रचना हैं।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  1. नूह का उल्लेख बाइबिल और अन्य पवित्र ग्रंथों में मिलता है।
  2. पाठ में उनके असली नाम के रूप में लशकर का उल्लेख है।
  3. एक घायल कुत्ते की घटना से उनके जीवन में करुणा का प्रसंग जुड़ा है।
  4. नूह ने कुत्ते को दुतकार दिया था।
  5. कुत्ते ने अपने उत्तर से सृष्टि की समानता का महत्वपूर्ण संदेश दिया।
  6. कोई भी जीव अपनी इच्छा से अपना रूप या जन्म नहीं चुनता।
  7. सभी जीवों का सृष्टिकर्ता एक ही है।
  8. यह प्रसंग जीवों के प्रति संवेदना और समान दृष्टि रखने की प्रेरणा देता है।

🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. नूह कौन थे?

उत्तर: नूह एक पैगंबर थे, जिनका उल्लेख बाइबिल और अन्य पवित्र ग्रंथों में मिलता है।

प्रश्न 2. नूह के रोने का कारण क्या था?

उत्तर: पाठ के अनुसार नूह के रोने का कारण एक घायल कुत्ता था, जिसे देखकर उनके मन में संवेदना उत्पन्न हुई।

प्रश्न 3. नूह ने कुत्ते को क्या कहा?

उत्तर: नूह ने कुत्ते को दुतकारते हुए कहा— “दूर हो जा गंदे कुत्ते!”

प्रश्न 4. कुत्ते ने नूह को क्या उत्तर दिया?

उत्तर: कुत्ते ने कहा कि न तो वह अपनी इच्छा से कुत्ता है और न नूह अपनी पसंद से इंसान हैं। बनाने वाला सबका एक ही है।

प्रश्न 5. कुत्ते के कथन का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: इसका मुख्य संदेश है कि सभी जीव एक ही सृष्टिकर्ता की रचना हैं। इसलिए किसी जीव को उसके रूप या स्थिति के कारण नीचा नहीं समझना चाहिए।


⭐ इस गद्यांश की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति

“न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान हो। बनाने वाला सबका तो वही एक है।”

इसका भावार्थ

मनुष्य को अपने मनुष्य होने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और किसी दूसरे जीव को उसके रूप के कारण तुच्छ नहीं समझना चाहिए। सभी प्राणियों की रचना एक ही सृष्टिकर्ता ने की है।


📜 इसीमें आगे दी गई कविता

मुद्दी से मुट्ठी मिले,
खो के सभी निशाना।
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचाना।

 

🌸 भावार्थ

कवि कहना चाहता है कि मनुष्य को केवल उसके बाहरी रूप, व्यवहार या दिखाई देने वाली स्थिति से पहचानना आसान नहीं है। हर व्यक्ति के भीतर कितनी संवेदना, अच्छाई, बुराई या मानवता छिपी है, यह तुरंत समझ पाना कठिन होता है।

जैसे मुट्ठी बंद होने पर उसके अंदर क्या है, यह दिखाई नहीं देता, उसी तरह किसी इंसान के मन के भीतर क्या चल रहा है, इसे केवल बाहर से देखकर नहीं जाना जा सकता।

कवि यह सवाल उठाता है कि किस व्यक्ति में कितना अपनापन, करुणा और मानवता है तथा कौन वास्तव में दूसरों के दुख को समझता है—इसकी पहचान कैसे की जाए?

💡 कविता का मुख्य भाव

इस कविता के माध्यम से मानवीय संवेदना, करुणा और दूसरों के दुख को समझने की क्षमता पर विचार किया गया है। कवि बताता है कि आज के समय में लोगों के बीच संवेदनशीलता कम होती जा रही है और व्यक्ति को उसके बाहरी व्यवहार से नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति उसके व्यवहार और संवेदना से पहचानना चाहिए।

एक लाइन में:
👉 सच्ची मानवता वही है जिसमें इंसान दूसरे के दुख को अपना दुख समझकर उसके प्रति संवेदना रखे।


 

📜 गद्यांश–4 :

मूल पाठ

“नूह ने जब उसकी बात सुनी और दुखी हो मुद्दत तक रोते रहे। ‘महाभारत’ में युधिष्ठिर का जो अंत तक साथ निभाता नज़र आता है, वह भी प्रतीकात्मक रूप में एक कुत्ता ही था। सब साथ छोड़ते गए तो केवल वही उनके एकांत को शांत कर रहा था।”

 

🔤 कठिन शब्दार्थ

·         मुद्दत — बहुत लंबे समय तक

·         अंत तक — आखिरी समय तक

·         प्रतीकात्मक — किसी विशेष भाव या विचार को दर्शाने वाला

·         एकांत — अकेलापन

·         शांत करना — सुकून देना, मन को संतुष्ट करना

 

📌 प्रसंग

इस गद्यांश में लेखक नूह और एक घायल कुत्ते की घटना के माध्यम से जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना की बात करता है। इसके बाद महाभारत के युधिष्ठिर का उदाहरण देकर बताता है कि कठिन समय में मनुष्य का साथ छोड़ देने वाले बहुत होते हैं, लेकिन एक पशु भी सच्चा साथी बन सकता है।

 

📝 सरल अर्थ

नूह ने जब घायल कुत्ते की बात सुनी कि न तो कुत्ता अपनी इच्छा से कुत्ता बना है और न ही नूह अपनी इच्छा से इंसान, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। वे इस बात से इतने दुखी हुए कि लंबे समय तक रोते रहे।

लेखक आगे महाभारत में युधिष्ठिर का उदाहरण देता है। जब युधिष्ठिर अपनी अंतिम यात्रा पर जा रहे थे, तब एक कुत्ता अंत तक उनके साथ बना रहा। रास्ते में दूसरे साथी उनका साथ छोड़ते गए, लेकिन वह कुत्ता उनके साथ चलता रहा और उनके अकेलेपन को दूर करता रहा।

 

💡 महत्वपूर्ण बातें

1.    नूह घायल कुत्ते की बात सुनकर बहुत दुखी हुए।

2.    कुत्ते ने नूह को यह समझाया कि सृष्टिकर्ता ने सभी जीवों को बनाया है।

3.    युधिष्ठिर के साथ अंत तक एक कुत्ते का रहना निष्ठा और साथ का प्रतीक है।

4.    मनुष्य कई बार साथ छोड़ देते हैं, लेकिन पशु भी मनुष्य के सच्चे साथी हो सकते हैं।

5.    गद्यांश का मुख्य भाव जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना और करुणा है।


 

गद्यांश–5 :

📜 मूल पाठ

“दुनिया कैसे वजूद में आई? पहले क्या थी? किस बिंदु से इसकी यात्रा शुरू हुई? इन प्रश्नों के उत्तर विज्ञान अपनी तरह से देता है, धार्मिक ग्रंथ अपनी-अपनी तरह से। संसार की रचना भले ही कैसे हुई हो लेकिन धरती किसी एक की नहीं है। पक्षी, मानव, पशु, नदी, पर्वत, समुद्र आदि की इसमें बराबर की हिस्सेदारी है। यह और बात है कि इस हिस्सेदारी में मानव जाति ने अपनी बुद्धि से बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी कर दी हैं। पहले पूरा संसार एक परिवार के समान था अब टुकड़ों में बैठकर एक-दूसरे से दूर हो चुका है। पहले बड़े-बड़े दालानों-आँगनों में सब मिल-जुलकर रहते थे अब छोटे-छोटे डिब्बे जैसे घरों में जीवन सिमटने लगा है। बढ़ती हुई आबादियों ने समुद्र को पीछे सरकाना शुरू कर दिया है, पेड़ों को रास्तों से हटाना शुरू कर दिया है, फैलते हुए प्रदूषण ने पंछियों को बस्तियों से भगाना शुरू कर दिया है। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया। अब गरमी में ज़्यादा गरमी, बेवक्त की बरसातें, जलजले, सैलाब, तूफ़ान और नित नए रोग, मानव और प्रकृति के इसी असंतुलन के परिणाम हैं। नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बंबई (मुंबई) में देखने को मिला था और यह नमूना इतना डरावना था कि बंबई निवासी डरकर अपने-अपने पूजा-स्थल में अपने खुदाओं से प्रार्थना करने लगे थे।”


🔤 कठिन शब्दार्थ

शब्द

अर्थ

वजूद

अस्तित्व

बिंदु

स्थान/अवस्था जहाँ से कोई चीज शुरू हो

हिस्सेदारी

भागीदारी

मानव जाति

मनुष्यों का समुदाय

दालान

घर का बड़ा खुला या अर्ध-खुला भाग

आबादी

जनसंख्या

प्रदूषण

पर्यावरण को दूषित करने वाली स्थिति

बारूद

विस्फोटक पदार्थ; यहाँ युद्ध और विनाश का प्रतीक

विनाशलीला

बड़े पैमाने पर होने वाला विनाश

बेवक्त

असमय

जलजला

भूकंप

सैलाब

बाढ़

सहनशक्ति

सहन करने की क्षमता

असंतुलन

संतुलन का बिगड़ना

खुदाओं

ईश्वर/भगवानों


📌 प्रसंग

इस गद्यांश में लेखक धरती और प्रकृति पर मनुष्य के बढ़ते हस्तक्षेप की चर्चा करता है। लेखक बताता है कि धरती केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि पक्षियों, पशुओं, नदियों, पर्वतों और समुद्रों की भी उतनी ही है। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि और विकास के नाम पर प्रकृति के साथ असंतुलन पैदा कर दिया है।


📝 सरल अर्थ

लेखक कहता है कि दुनिया की शुरुआत कैसे हुई और इसका अस्तित्व कैसे आया, इस बारे में विज्ञान और धार्मिक ग्रंथ अलग-अलग उत्तर देते हैं। लेकिन संसार की उत्पत्ति चाहे जैसे हुई हो, धरती पर केवल मनुष्य का अधिकार नहीं है।

इस धरती पर पशु-पक्षी, नदियाँ, पर्वत, समुद्र और अन्य जीव-जगत का भी उतना ही अधिकार है जितना मनुष्य का। पहले मनुष्य और प्रकृति के बीच अधिक सामंजस्य था। लोग बड़े घरों, आँगनों और खुले स्थानों में मिल-जुलकर रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे बढ़ती आबादी और आधुनिक विकास के कारण मनुष्य ने प्रकृति को अपने अनुसार बदलना शुरू कर दिया।

मनुष्य ने पेड़ों को काटकर रास्ते और इमारतें बनाईं, समुद्र के किनारों तक आबादी फैलाई और प्रदूषण के कारण पक्षियों तथा अन्य जीवों के रहने के स्थान कम कर दिए। युद्ध और बारूद के कारण भी वातावरण को भारी नुकसान पहुँचा।

इन सबका परिणाम आज हमें अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, भूकंप, बाढ़, तूफान और नए-नए रोगों के रूप में देखने को मिलता है।

लेखक अंत में चेतावनी देता है कि प्रकृति की सहन करने की भी एक सीमा होती है। जब मनुष्य प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ करता है तो प्रकृति भी अपना संतुलन बिगड़ने पर विनाशकारी रूप दिखा सकती है। लेखक मुंबई में आए एक डरावने प्राकृतिक संकट का उदाहरण देकर बताता है कि ऐसी स्थिति में लोग भयभीत होकर अपने-अपने ईश्वर से प्रार्थना करने लगे थे।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  1. धरती केवल मनुष्य की नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत की साझा संपत्ति है।
  2. मनुष्य ने अपनी बुद्धि और विकास के कारण प्रकृति के साथ असंतुलन पैदा किया है।
  3. बढ़ती आबादी के कारण पेड़ों, समुद्र और प्राकृतिक स्थानों पर दबाव बढ़ रहा है।
  4. प्रदूषण के कारण पक्षियों और अन्य जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं।
  5. युद्ध और बारूद से वातावरण को नुकसान पहुँचता है।
  6. अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, बाढ़, तूफान और नए रोगों को लेखक मानव और प्रकृति के असंतुलन का परिणाम बताता है।
  7. प्रकृति की सहनशक्ति सीमित है।
  8. इस गद्यांश का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलन और सह-अस्तित्व की भावना से रहना चाहिए।

🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. धरती पर किन-किन की बराबर की हिस्सेदारी बताई गई है?

उत्तर: धरती पर पक्षी, मानव, पशु, नदी, पर्वत, समुद्र आदि सभी की बराबर की हिस्सेदारी बताई गई है।

प्रश्न 2. मानव जाति ने प्रकृति के साथ क्या किया है?

उत्तर: मानव जाति ने अपनी बुद्धि और विकास के कारण प्रकृति पर हस्तक्षेप बढ़ाया है। उसने पेड़ों को हटाया, समुद्र के किनारों तक आबादी फैलाई और प्रदूषण बढ़ाकर प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।

प्रश्न 3. मानव और प्रकृति के असंतुलन के क्या परिणाम बताए गए हैं?

उत्तर: अधिक गर्मी, असमय वर्षा, जलजले, सैलाब, तूफान और नए-नए रोग मानव और प्रकृति के असंतुलन के परिणाम बताए गए हैं।

प्रश्न 4. “नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है” का क्या आशय है?

उत्तर: इसका आशय है कि प्रकृति मनुष्य द्वारा किए जा रहे अत्याचार और हस्तक्षेप को हमेशा सहन नहीं कर सकती। एक सीमा के बाद प्रकृति अपना विनाशकारी रूप दिखाकर संतुलन स्थापित करने लगती है।


 

📖 गद्यांश 7

शीर्षक — जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना और बदलता संसार

📜 मूल पाठ

“ग्वालियर में हमारा एक मकान था, उस मकान के दालान में दो रोशनदान थे। उसमें कबूतर के एक जोड़े ने घोंसला बना लिया था। एक बार बिल्ली ने उचककर दो में से एक अंडा तोड़ दिया। मेरी माँ ने देखा तो उसे दुख हुआ। उसने स्टूल पर चढ़कर दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश की। लेकिन इस कोशिश में दूसरा अंडा उसी के हाथ से गिरकर टूट गया। कबूतर परेशानी में इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे। उनकी आँखों में दुख देखकर मेरी माँ की आँखों में आँसू आ गए। इस गुनाह को ख़ुदा से मुआफ़ कराने के लिए उसने पूरे दिन रोज़ा रखा। दिन-भर कुछ खाया-पिया नहीं। सिर्फ़ रोती रही और बार-बार नमाज़ पढ़-पढ़कर ख़ुदा से इस गलती को मुआफ़ करने की दुआ माँगती रही।

ग्वालियर से बंबई की दूरी ने संसार को काफ़ी कुछ बदल दिया है। वर्सोवा में जहाँ आज मेरा घर है, पहले यहाँ दूर तक जंगल था। पेड़ थे, परिंदे थे और दूसरे जानवर थे। अब यहाँ समंदर के किनारे लंबी-चौड़ी बस्ती बन गई है। इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों-चारिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से कुछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं, उन्होंने यहाँ-वहाँ डेरा डाल लिया है। इनमें से दो कबूतरों ने मेरे फ्लैट के एक मचान में घोंसला बना लिया है। बच्चे अभी छोटे हैं। उनके खिलाने-पिलाने की ज़िम्मेदारी अभी बड़े कबूतरों की है। वे दिन में कई-कई बार आते-जाते हैं। और क्यों न आएँ-जाएँ आखिर उनका भी घर है। लेकिन उनके आने-जाने से हमें परेशानी भी होती है। वे कभी किसी चीज़ को गिराकर तोड़ देते हैं। कभी मेरी लाइब्रेरी में घुसकर कबीर या मिर्ज़ा ग़ालिब को सताने लगते हैं। इस रोज़-रोज़ की परेशानी से तंग आकर मेरी पत्नी ने उस जगह जहाँ उनका आशियाना था, एक जाली लगा दी है, उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया है। उनके आने की खिड़की को भी बंद किया जाने लगा है। खिड़की के बाहर अब दोनों कबूतर रात-भर ख़ामोश और उदास बैठे रहते हैं। मगर अब न सोलोमन है जो उनकी ज़ुबान को समझकर उनका दुख बाँटे, न मेरी माँ है, जो इनके दुखों में सारी रात नमाज़ों में काटे—

नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम।
सूरज ठेकेदार-सा, सबको बाँटे काम।।


🔤 कठिन शब्दार्थ

कठिन शब्द

अर्थ

दालान

घर का खुला या अर्ध-खुला भाग

रोशनदान

हवा और रोशनी आने के लिए बनी खिड़की

उचककर

ऊपर की ओर उठकर

फड़फड़ाना

पंखों को तेजी से हिलाना

गुनाह

अपराध/पाप

मुआफ़

क्षमा

रोज़ा

उपवास

दुआ

प्रार्थना

वजूद

अस्तित्व

परिंदे

पक्षी

चारिंदे

चौपाए/जानवर

डेरा डालना

कहीं ठहर जाना

मचान

ऊँचा बना हुआ स्थान

आशियाना

घर/घोंसला

ख़ामोश

शांत/चुप

उदास

दुखी

ज़ुबान

भाषा

दुख बाँटना

किसी के दुख को समझकर उसमें सहभागी होना

सींचना

पानी देना

ठेकेदार

किसी काम को करने का ठेका लेने वाला व्यक्ति


📌 प्रसंग

इस गद्यांश में लेखक अपने ग्वालियर के पुराने घर की घटना को याद करता है, जहाँ उसकी माँ कबूतरों के अंडे टूट जाने से बहुत दुखी हो गई थीं। यह घटना उनकी जीव-जंतुओं के प्रति गहरी संवेदना को दर्शाती है।

इसके बाद लेखक वर्तमान समय में मुंबई के वर्सोवा क्षेत्र का वर्णन करता है, जहाँ बढ़ती बस्ती और शहरीकरण के कारण पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक घर छिन गए हैं। लेखक अपने घर में रहने वाले कबूतरों के माध्यम से मनुष्य और पक्षियों के बीच घटते सामंजस्य की ओर ध्यान दिलाता है।


📝 सरल अर्थ

लेखक बताता है कि ग्वालियर में उनके पुराने घर के दालान में कबूतरों ने अपना घोंसला बना रखा था। एक दिन बिल्ली ने उनका एक अंडा तोड़ दिया। लेखक की माँ को यह देखकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्य से वह अंडा भी उनके हाथ से गिरकर टूट गया।

कबूतर बहुत परेशान होकर इधर-उधर फड़फड़ाने लगे। उन्हें दुखी देखकर लेखक की माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें लगा कि उनसे एक जीव के प्रति गलती हो गई है। इस गलती के लिए ईश्वर से क्षमा माँगने के उद्देश्य से उन्होंने पूरे दिन रोज़ा रखा, कुछ खाया-पिया नहीं और नमाज़ पढ़कर बार-बार क्षमा की प्रार्थना की।

इसके बाद लेखक बताता है कि ग्वालियर से मुंबई आने के दौरान संसार में बहुत बदलाव आ गया। जिस वर्सोवा में आज उनका घर है, वहाँ पहले दूर-दूर तक जंगल हुआ करता था। वहाँ पेड़, पक्षी और दूसरे जानवर रहते थे। लेकिन अब वहाँ बड़ी-बड़ी बस्तियाँ बस गई हैं। इन बस्तियों ने अनेक पक्षियों और जानवरों से उनके प्राकृतिक घर छीन लिए हैं।

कुछ पक्षी वहाँ से चले गए, लेकिन जो नहीं जा सके उन्होंने नई जगहों पर अपना ठिकाना बना लिया। लेखक के फ्लैट में भी दो कबूतरों ने एक मचान पर घोंसला बना लिया। उनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और बड़े कबूतर उन्हें खिलाने-पिलाने के लिए बार-बार आते-जाते हैं। लेखक समझता है कि वे आखिर अपने ही घर में आ-जा रहे हैं।

लेकिन कबूतरों के कारण घरवालों को परेशानी भी होती है। वे चीज़ें गिरा देते हैं और कभी-कभी लेखक की लाइब्रेरी में जाकर किताबों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। इस परेशानी से परेशान होकर लेखक की पत्नी ने उनके आशियाने वाली जगह पर जाली लगा दी और उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया। उनकी आने-जाने वाली खिड़की भी बंद कर दी गई।

अब दोनों कबूतर रातभर खिड़की के बाहर चुप और उदास बैठे रहते हैं। लेखक को पुराने समय की याद आती है। वह कहता है कि अब न तो सुलेमान जैसा कोई है जो उनकी भाषा समझकर उनका दुख बाँट सके और न उसकी माँ जैसी कोई है जो उनके दुख को अपना दुख समझकर उनके लिए प्रार्थना करे।

 

🌸 अंतिम दो पंक्तियों का भावार्थ

“नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम।
सूरज ठेकेदार-सा, सबको बाँटे काम।।“

इन पंक्तियों में प्रकृति के अलग-अलग तत्वों के अपने-अपने कार्य बताए गए हैं। नदी खेतों को पानी देती है, तोता आम खाता है और सूरज सबको अपने-अपने काम के लिए ऊर्जा देता है।

अर्थात् प्रकृति में हर जीव और प्रत्येक प्राकृतिक तत्व की अपनी भूमिका है। किसी को भी बेकार या अनावश्यक समझना उचित नहीं है।


💡 महत्वपूर्ण बातें

  1. लेखक की माँ जीव-जंतुओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील थीं।
  2. कबूतर का अंडा टूटने पर माँ ने स्वयं को दोषी मानकर ईश्वर से क्षमा माँगी।
  3. ग्वालियर के जंगलों की जगह मुंबई में बड़ी-बड़ी बस्तियाँ बस गईं।
  4. शहरीकरण के कारण पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक आवास कम हो गए।
  5. कबूतरों ने लेखक के फ्लैट में अपना नया आशियाना बनाया।
  6. कबूतरों से परेशानी होने के बावजूद लेखक यह मानता है कि उनका भी उस जगह पर रहने का अधिकार है।
  7. मनुष्य की सुविधा और प्रकृति के अधिकार के बीच संघर्ष इस गद्यांश में दिखाई देता है।
  8. लेखक को अपनी माँ की संवेदनशीलता की कमी महसूस होती है।
  9. सुलेमान और लेखक की माँ यहाँ जीव-जंतुओं के दुख को समझने वाली संवेदनशीलता के प्रतीक हैं।
  10. अंतिम पंक्तियाँ प्रकृति के सह-अस्तित्व और प्रत्येक जीव की उपयोगिता का संदेश देती हैं।

🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. लेखक की माँ कबूतर के अंडे टूटने पर क्यों दुखी हुईं?

उत्तर: बिल्ली ने कबूतर का एक अंडा तोड़ दिया था। दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश में वह भी माँ के हाथ से गिरकर टूट गया। कबूतरों को परेशान देखकर माँ को बहुत दुख हुआ और उन्होंने स्वयं को इस घटना के लिए जिम्मेदार समझा।

प्रश्न 2. लेखक की माँ ने अपने गुनाह को माफ कराने के लिए क्या किया?

उत्तर: उन्होंने पूरे दिन रोज़ा रखा, कुछ खाया-पिया नहीं और बार-बार नमाज़ पढ़कर ईश्वर से अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी।

प्रश्न 3. वर्सोवा में पहले और अब क्या अंतर आ गया है?

उत्तर: पहले वर्सोवा में दूर-दूर तक जंगल था। वहाँ पेड़, पक्षी और दूसरे जानवर रहते थे। अब वहाँ समुद्र के किनारे लंबी-चौड़ी बस्ती बन गई है, जिसके कारण अनेक पक्षियों और जानवरों के प्राकृतिक घर छिन गए हैं।

प्रश्न 4. कबूतरों के आने-जाने से लेखक के परिवार को क्या परेशानी होती थी?

उत्तर: कबूतर कभी-कभी घर की चीज़ें गिराकर तोड़ देते थे और लेखक की लाइब्रेरी में घुसकर किताबों को परेशान करते थे। इसी कारण परिवार को असुविधा होती थी।

प्रश्न 5. लेखक की पत्नी ने कबूतरों की समस्या का क्या समाधान किया?

उत्तर: उन्होंने उस जगह पर जाली लगा दी जहाँ कबूतरों ने अपना आशियाना बनाया था। उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया गया और कबूतरों के आने-जाने वाली खिड़की को भी बंद किया जाने लगा।

प्रश्न 6. “मगर अब न सोलोमन है... न मेरी माँ है” से लेखक क्या कहना चाहता है?

उत्तर: लेखक कहना चाहता है कि अब उसके आसपास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो पक्षियों की भाषा और उनके दुख को समझ सके। उसकी माँ की तरह जीव-जंतुओं के दुख को अपना दुख समझकर उनके लिए प्रार्थना करने वाली संवेदनशीलता भी अब उसे दिखाई नहीं देती।


 🎯 निदा फ़ाज़ली - जीवन परिचय 

🎯 निदा फ़ाज़ली - अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले, प्रसंग, व्याख्या, कठिन शब्दार्थ 

🎯 निदा फ़ाज़ली - अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले, प्रश्न - उत्तर 

🎯 निदा फ़ाज़ली - अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले, पूरा पाठ 


 

 


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